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Showing posts from December, 2021

गोविन्द

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पुनीत चित्तवृत्ति की भावना पुनीत है। आपके स्पर्श से पतित भी पुनीत है।। कालिमा के मध्य मे सूर्य सा प्रकाश हो। निर्मलता के मंच पर प्रथम पात्र आप हो।। श्रेष्ठ की श्रेष्ठता में अतुलनीय आप हो। शब्द ही नहीं है वह जिन शब्दों से बखान हो।। आपकी लेखनी में स्वयं वाग्देवी का वास है। और मृदु वाणी में श्री कृष्ण का निवास है।। द्वेष और ईर्ष्या के बंधनों से मुक्त हो। प्रेम और नेह की भावना से युक्त हो।। आप समय से नहीं समय आपके बद्ध हो। दिनकर से भी अधिक तेजवान आप हो।।   आपके समक्ष तो चंद्र दोषपूर्ण है। गुण और कलाओं से आप परिपूर्ण है।। स्यामंतक मणि सा आप में प्रकाश हो। कांटे भी आपके पथ पर पुष्पो के समान हो।। ज्ञान और विवेक का अनुपम स्वरूप हो। अनुराग और उत्कर्ष का अद्वितीय रूप हो।।

पन्ने मत पलटना

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मत जाना उस पुराने किताबखाने में,  जहां धूल से सनी... कुछ किताबे रद्दी होने को है। पहुंच ही गए हो तो, पन्ने मत पलटना, नहीं तो समय के बल से पड़े....! घिसे हुए शब्द, फिर से सजीव हो उठेंगे।  उनमे अभी है कुछ पुरानी यादें, जो तुम्हारे स्पर्श से,  सिसकियां ले चीख पड़ेंगी.... और वह चंदन की धूप, जिसके धुंयै से बनती आकृति...., सदैव एक उम्मीद को आसरा देती थी! मत छूना उस धूपदानी को। मटमैली हो चुकी, वह झीना श्वेत चादर जिस पर सुप्त पड़ी स्मृति की सलवटे पुनः जागृत हो जायेंगी..... और वह पुष्पपात्र...! जिसमे वर्षो से मुरझाये हुए, पलाश कुसुम नयन मूंदे पड़े है... तुम्हारे कस्तूरी गंध से  पुनः तरुणाई पा लेंगे। खिड़की को ढांके इस आवरण को, मत स्पर्श करना...! नही तो अतीत के चलचित्र  बीती बातों का, सब हाल कह देंगे। वह घाव जिसपे वर्षो से.... वर्तमान की पट्टी बांधती आ रही हूं, उसे और विषैला कर देंगे। मेरे कक्ष की सज्जा, करने का स्वप्न है तुम्हारा। यहां मात्र स्मृतियों के कुछ भी नही, यदि शेष चेतना चाहते हो, यहां मात्र बिंब के कुछ भी नही।। बस धमनियो मे शेष शोणित बूंदे, इस अस्थि चर्...

श्वेत मोती सी मै तो संवरने लगी हूं

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  तेरे चमकीले नैनों में ढलने लगी हूं, श्वेत मोती सी मै तो सवरने लगी हूं...... दूर बगिया में जो एक कली खिल रही थी। देख रांहे एकाकी निशा मिल रही थी।।  पीछे से पर्वतों के है बुलाता कोई। राग सावन के है गुनगुनाता कोई।।  मैं भी स्वर में स्वर को मिलाने लगी हूं , श्वेत मोती सी मैं तो सवरने लगी हूं....... देता अधरों से छूकर निमंत्रण कोई। तब ना रहता है खुद पर नियंत्रण कोई।। आसमानी सा परिधान धारण किए । मंद सी मस्त मुस्कान अग्रसारण किए।। मैं भी अब अकारण मुस्कुराने लगी हूं , श्वेत मोती सी मै तो सवरने लगी हूं...... समीरण की छुअन से लगते हो तुम। निर्झरिणी में निर्मल से बहते हो तुम।। रेत पर नाम लिख कर मिटाती रही। कल के सपनों का घरौंदा बनाती रही।। बैठकर तट पर शशि को तकने लगी हूं, श्वेत मोती सी मै तो सवरने लगी हूं....... गर्मियों की शीतल सी शाम हो तुम। सर्दियों का गुनगुना सा घाम हो तुम।। बंद नैनों में तुम ही तुम समाए रहे। बनके काली घटा आसमा पर छाए रहे।। मैं भी बारिश के संग-संग बरसने लगी हूं, श्वेत मोती सी मैं तो सवरने लगे हूं.......

तब टूटता है मौन

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सकुचायी वाणी मन मे एक टीश भरे, फिर भी अधरो को खींच हृदय विदीर्ण किये, कंचुक मे थर्राती लोहित की बूंदे , समर्पण पर भी ना जाने क्या शेष रह जाता है । जो शिखा पकड़ भूमि पर घसीटा जाता है।।  बोलो ऐसी परिस्थिति पर चुप रहेगा कौन...?  तब टूटता है मौन.... पितृ प्रेम में इठलाती,  मां के आंचल में छुप जाती।  पुष्पों का भी भार लगे जिस को भारी,  आज उदासी जीवन की छुपाती।।  नैनो का नीर सूखकर चिपक गया कपोलो पर।   प्रहार किया जाता हर बार मेरी भावनाओं पर।।  बोलो ऐसी परिस्थिति पर चुप रहेगा कौन...?  तब टूटता है मौन..... कितने अभ्यस्त हो मिथ्या वाचन में, मेरी उदारता को मूर्खता समझ लेते हो,  यह निश्छल प्रेम है जो चुप कर जाता है , कोई गणना नही तुम्हारे सारे अपराधो की।  फिर भी सीमाये पार करते हो धृष्टता की।।  बोलो ऐसी परिस्थिति पर चुप रहेगा कौन.....?  तब टूटता है मौन....  अभंगुर पीड़ा बन गई तुम्हारी प्रवृत्ति। करो ना वहीं पूर्व सी प्रणय निवृत्ति।।  हृदय विदारक स्वर के प्रहार।  उपयोग मात्र का ही करते हो व्यवहार।।  अब ...

करुण बेला

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आ गयी है करुण बेला,  परिणय के अवसाद की•••••• अरुणोदय था हुआ,  जिसका कालांतर के पूर्व।  हो रही परिमेय श्वासें,  जिसकी अब परिपूर्ण।।  सांध्य की कालिमा का,  हो रहा आघात। शून्य होती जा रही , प्राणअग्नि ताप।। छा रही है घोर बदली,  हृदय पर विषाद की••••••••! आ गई है करुण बेला परिणय के अवसाद की••••••••  परिनिर्णय हो चुका , हमारे पाणि अंत का। समय है अब आ चुका , मृत्यु के परिग्रहण का ।। प्रारंभ की सिंदूर रेखा,  एक ईप्सा कर रही।  अंततोगत स्पर्श पाने की,  मनोरथ कर रही।। मेरे तुम्हारे धीर और अधीर के,  परिप्रेक्ष्य की•••••••••‌! आ गई है करुण बेला परिणय के अवसाद की•••••••••  आज पुनः केश मेरे सुमन, सुसज्जित तुम करो। जितनी ॠतुयें छूटी तुम बिन, सभी सानंद उपस्थित करो।।  पद्मप्रसून, पुष्परज लेपित , चंदन सी शीतलता।  कंठबेल,कर्णकुसुम,कंगन, मेहंदी की कांतिक्ता।। तिरोधन कर वेदना का, अनुराग के अवधान की••••••••! आ गई है करुण बेला परिणय के अवसाद की•••••••••• हिय करुणा में व्यापा है, तुम बिन कौन सुने इसकी।  गतायु होने को आय...

लुप्त होना है तुम मे मुझे

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भीड़ में जिस भांति  लुप्त हो जाता है  एकाकी हृदय  वैसे ही लुप्त होना है  तुम मे मुझे  अनात्म हो भौतिकता से भिन्न  प्रणय के नवीन लोक में  पूर्वोत्तरीय आकाश में  पिंड बन स्थिर होना है  चंद्रमा की शीतलता  मार्तंड की सुर्ख लालिमा  ताजमहल की उज्जवल कांति  हमारे प्रेम को प्रदर्शित करती है उतना  जितना सागर की गहराइयों में छुपे मोती की खोज  तुम बढ़ाना चाहो तो बढ़ता है प्रेम  घटाना चाहोगे तो घट जाएगा प्रेम  पता नहीं क्या है  जो मेरे रुधिर से सींचता है  पलाश या कनेर  प्रेम में महकता है  अत्यंत दुर्लभ होता है  व्यक्त करना  फिर भी यह ह्रदय  तुम्हारे लिए ही धड़कता है  सांध्य वेला पर जुगनुओ का झुंड  भोर में खिली कुमुदिनी  हिमबिंदु से जिस भांति गुलमोहर ढकता है  अपने रक्तिम पुष्पों को  वैसे ही प्रेम के अनावरण से  ढकना है तुमको

तुम कहते हो मै सुंदर हूं

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तुम कहते हो,  मैं सुंदर हूं.... यह प्रेम की अभिव्यक्ति है, या मन की वासना। काम के पाश में बंधकर निहारते हो मेरी देह, और इसे संज्ञा संतोष की देते हो, फिर भी संतोष नहीं मिलता, हृदय में वही उद्विग्नता क्यों मचलती है। यदि यह संबंध प्रेम है,  तो मैंने प्रेम में अथाह सुख भोगा है,   फिर शांति क्यों नहीं.......  मैं सुंदर हूं इसलिए प्रेम है, या प्रेम है इसलिए सुंदर हूं। कुछ समय पश्चात....... जब ढल जाएगा यौवन मेरा, क्या तब भी सिर्फ इच्छाएं तृप्त करोगे?  यह मेरे कंपकपाते हाथों का सहारा भी बनोगे। तब प्रेम की अनुभूति का..... सच्चा अर्थ समझ आएगा,  तब काम और वासना से विमुक्त होगे। यदि अश्लीलता प्रेम है, तो प्रेम में श्रद्धा और पूजा कैसी, क्या अधूरे रह जाएंगे स्वप्न बालाओं के? जिन्होंने कभी दर्पण नहीं देखा..... क्या उन्हें प्रेम का रसास्वादन कभी ना होगा? जो सौंदर्य की परिपाटी पर खरी नहीं उतर पाती। या देखेगा कोई मन, तन पर गौर ना करेगा.... कामायनी की श्रद्धा सुंदरी परी , मनु के मन मे घर करती हैं...!  कारण मात्र सौंदर्य, यदि सुंदर ना होती श्रद्धा...! तो...

समर्पण

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प्रेम समर्पण है यदि कर सको तो करो।  प्रेम अग्नि है यदि जल सको तो जलो।। व्यर्थ में प्रीत बदनाम करते हो क्यों। आकर्षण को आसक्ति कहते हो क्यों।।  प्रेम यदि है तुम्हारा राधिका की तरह। विरह सागर में डूबी गोपियो की तरह।।  तो चलती डगर में भटकते हो क्यों।  एक हृदय को विभक्त सौ बार करते हो क्यों।।  खुद की तुलना मीरा से करने लगे।  सूर्य के साम्य स्वयं को कहने लगे।।  छोड़ साहस दुनिया से डरते हो क्यों।  संदेह ईश्वर के होने पर करते हो क्यों।।  विष का प्याला यदि पी सको तो पियो।  बन सको यदि समंदर तो तुम बनो।।  मात्र बूंदों में जीवन पाते हो क्यों। आकर्षण को आसक्ति कहते हो क्यों।।

इंद्रधनुष के सप्तरंगों में विलीन होना चाहती हूं

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संधि कर मै और तुम कि हम होना चाहती हूं......... इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं.......  शिशिर की छनती हुई धूप में,  कोहरे की सौंधी धुंध में!  बिन मौसम बरसात होना चाहती हूं......! इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं.......  अचेतन हृदय का निमंत्रण,  द्वीपों के पुजं में विलीन हो गया.. टकराकर त्वरित लहरों से,  त्रस्त हो लौट आया....!  छोड़ इन औपचारिक पत्रों को...   श्वासो का निमंत्रण भेजना चाहती हूं....... इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं......  नीलमणि की ऊष्म गंध,  पंखुड़ियों पर ठहरी शीकर , सिकुड़ता हुआ पलाश वृक्ष,  मंदाकिनी की गुनगुनी रेत..।  इन सब का अनुराग तुम्हें सौंपना चाहती हूं....... इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं....... बुलाता है ! तुम्हें मोर पंख का सांवला रंग, प्रतीक्षा में नीले पड़ चुके शुष्क अधर,  आंखों को घेरे विरह के स्याही...।  इन सब की प्रतीक्षा का अंत करना चाहती हूं.......  इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं.......

सुन न मांझी

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सुन न मांझी.......  तेरी पतवार असंख्य बूंद पानी को पीछे धकेलती है। तभी तो आगे बढ़ पाती है।। आश्चर्य में पड़ता है,मन! क्या है ? जो तेरी नाव को उबारे हुए हैं।  इन चिड़ियो की कौतूहल को संभाले हुए है।। सूर्य कैसे उदित होता है?  कैसे ढल जाता है?  इस रहस्य को बनाए हुए है.....  हर दिन गुजरता है तभी तो वर्ष बन पाता है।  यह प्रकृति स्वास देती है तभी तो मनुष्य जी पाता है।। एक अंकुर से कितना बड़ा वृक्ष बन जाता है। एक एक शब्द से साहित्य रच जाता है।।

पत्नी की अभिलाषा

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सुनो तुम्हारे साथ चलना है  चलने दो ना......  तुम्हारे साथ हंस भी लूंगी।  पर अपने गमों पर रोने भी दो ना.......  यकीन करो तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगी।  पर तुम भी मेरी राहों में मेरा साथ दो ना......  तुम्हारी पत्नी ही नहीं दोस्त भी बनूंगी।  मैं और तुम को मिलाकर हमसफर बनने दो ना.......  तुम मेरे लिए सब कुछ हो,  तुम्हारी हर बात का सम्मान करूंगी।  भले ही सर की पगड़ी ना बनाओ,  पर जूती भी मत बनने दो ना.......  बेशक मत बनाओ मुझे अपना स्वाभिमान।  पर मेरी इच्छाओं और आत्मसम्मान को जिंदा रहने दो ना........  हर बार मैं ही माफी मांगूगी।   कभी तुम भी गलती मान लो ना.......  तुम मेरी धड़कनों में बसते हो।  मुझे अपने पास रहने दो ना.......  मैं सब की सुनती हूं सबका ख्याल रखती हूं।  कभी तुम भी सर दर्द होने पर मुझे बाम लगा दो ना.......  फूल और कांटों में सिर्फ फूलों की डगर तुम्हारे लिए चाहूंगी।  पर तुम ही मेरे जीवन में एक गुलाब खिला दो ना.........  सुनो तुम जान हो मेरी  हर दुख सुख म...

I can't explain her pain

I can't explain her pain  who is smiles even  after suffering  who is being burdened  with poverty and helpless  Still when returning home  in the evening buying happiness brings  He endures his unbearable pain To make the family happy  At that time it seems as if my misery is insignificant  He has played the biggest character in this world Who has smiled and hidden every pain ♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡ { I can't explain her pain } ♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡♡

तुम्हारा दृढ़ विश्वास

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पृथक नहीं अद्वैत नहीं,  यह भाव तुम्हारा कब होगा।  शांत नहीं विद्रोह नहीं,  वह प्रेम तुम्हारा कब होगा ।। नभ की सुनी चादर बुनना,  यह काम तुम्हारा कब होगा।  वृहत नहीं जो सूक्ष्म नहीं जो , वह अभ्यूत्थान तुम्हारा कब होगा।।  अंधविश्वासो में डूबे हो,  आत्मविश्वास जागृत कब होगा । जब आंखे खोलो तभी भोर,  मत देखो विफलताओं की ओर।।  जब कर्तव्य को समझोगे अपने , उत्थान तुम्हारा तब होगा । गर्व बनोगे मातृभूमि का जब  , सम्मान तुम्हारा तब होगा।।  रवि शिखर के पीछे डूबा है , उदय मध्य में कब होगा।   त्रेकालिक विद्रोह है यह,  नष्ट कभी तो यह होगा ।। तुम काट नहीं सकते जिसको , यह उस विष का अमृत होगा।  जब सूर्य से ऊपर चमकोगे,   सफल जन्म तुम्हारा तब होगा ।। कुरीतियों की दीवार खड़ी है , खण्डन उसका तब होगा।  जब अडिग रहोगे कर्मों पर,  सुखद हिंदुस्तान तुम्हारा तब होगा ।।

दहेज एक कुप्रथा

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हाय क्या हुआ आज यह छा गई त्रासदा आंगन में...!  जिस आंगन की वह शोभा थी आज पड़ी निर्जीव है वो,  चढ़ गई शूली पर आखिर क्यों ? निर्गुण प्रतिमा बन कर जिसने जीवन का विस्तार किया।  एक शर्त के खातिर जिसने जीवन का निस्तार किया।।  शालीनता की प्रतिमूरत है, करुणा का भाव है वह।  लज्जा जिसकी पलकों पर घुंघट ही जिसका गहना है।।  नब्जो को टटोलता फिर कोई क्या शेष बचे हैं प्राण अभी ? कैसे निष्ठुर है लोग यहां जो तोले जीवन को धन से !! नारी का रूप ही दुर्गा है नारी का रूप ही काली है।  नारी से ही जग का जीवन है नारी ही जग कि पालक है।। पर समझे ना इसको कोई समझी जाती है वस्तु कोई।  जिसने आंचल में छुपा लिया वह मां भी नारी रूपा है ।  फिर नारी का अपमान करो तो कैसे मां के पूत हो , क्या तनिक नहीं करुणा हृदयातल में जो नारी का सम्मान करो।  क्या तनिक नहीं देवत्व तुममे जो देवी समझो नारी को।  वेदो सी गाथा है जिसमें पुराणों सी जिसमें शोभा है । सतीत्व है जिसमें सीता सा द्रौपदी के जैसी क्षमता है।।  कान्ति है जिसमें हीरे सी सोने के जैसी दृढ़ता है । उस नारी क...

प्रेम अवधूतिका

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मैं इन लौकिक संबंधों से परे एक अलौकिकता हूं , मैं तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं...... विरक्त हो इन सामाजिक बंधनों से, तोड़कर इन परंपराओं के बंधन को। मानवता की परिकल्पना हूं, मैं तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।   मन को अनियंत्रित करे जो दुर्भाव,  संकोच और घुटन का प्रभाव। इन प्रकोपो की प्रचंडता हूं, मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।। निज प्रीत कर्मो की संलग्न, मोह और देह से विरक्त। इस सृष्टि मे अनुराग की अरविता हूं, मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।। मै रमी हूं इन दुकूलनियों मे, आकाश की वैभवमयी विराटता मे। संसार के वैमनस्य की कटाक्षता हूं, मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।   मै खनकती चूड़ियों का अनुराग हूं, मै महकते गजरे का राग हूं। मै अरुण सिन्दूर की लालिमा हूं, मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।। मुझसे विरक्त कुछ भी न संसार मे, मै रमी कृष्णवाणी के सार मे। हर हृदय मे बसी प्रेम विभूषिता हूं, मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।। भक्ति और प्रीत के मध्य का प्रमाद हूं, मैं मधुर संगीत की तान हूं। मैं खग मृग की वाणी की मधुरता हूं, मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हू...

हे! प्रकृति के अवधूत सुनो

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हे!प्रकृति के अवधूत सुनो, जीवन को जीने का मन है....  बनकर खग मृग इन निर्झरियों में, कौतूहल करने का मन है।  जीवन को जीने का मन है..... नभ की बहती धाराओं में , वर्षा बन बहने का मन है । जीवन को जीने का मन है.....  बन शिरीष का पुष्प कोई,  माला में गुंथने का मन है । जीवन को जीने का मन है.... ऊंची सी कोई अट्टालिका पर , बैठ कूकने का मन है । जीवन को जीने का मन है..... रति की पायल का बन नूपुर, छम छम कर बजने का मन है।  जीवन को जीने का मन है..... चंदन सा शीतल बन करके,  हरि मस्तक सजने का मन है। जीवन को जीने का मन है......  पवन वेग के झोंकों से इन इठलाती,  शाखाओं के कोपल बनने का मन है।  जीवन को जीने का मन है...... तट सरिता का छूने वाली खाकर हिलोर,  मदमाती धारा बनने का मन है। जीवन को जीने का मन है...... शशि मुख मंडल को देख-देख, खुद पर इतराने का मन है। जीवन को जीने का मन है..... गोधूम की सुनहरी बालियों पर, तितली बन उड़ने का मन है। जीवन को जीने का मन है...... बनकर बसंत का नव गायन,  स्वर वाचन होने का मन है। जीवन को जीने का मन है...... सा...

मध्य की अवस्था

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क्या कभी होगा, उस व्याकुलता का उद्धार। जो प्रथम और अंतिम कड़ी के, मध्य बनी हुई है...... या यूं ही, अतृप्त अवस्था में, भटकती रहेगी सहस्त्र वर्षों तक....... अचेतन जड़ता भरे , चक्षुओ की प्रतीक्षा का अंत•• संभव हो सकेगा, या मनुकाल का साक्षी, बना चंद्र मेरे निस्सार जीवन की भी.... अगली पीढ़ी को गवाही देगा। कुंठा और तीक्ष्ण अवस्था के मध्य, जो सामंजस्य है। उससे प्रमोद कहूं....? या अहर्ष? अब तो सारी स्थितियां... दुविधा के घेरे में खड़ी  विलाप कर रही है । क्योंकि वह शब्द हीन  होने के साथ-साथ , संज्ञा हीन भी हो गई है। जब जब इस कालजई, विद्युत रेखा की गर्जना सुनती हूं। ऐसा जान पड़ता है , मानो वह इस वीभत्स कालखंड से, अपने क्रूर होने का , प्रतिघात ले रही हो ...... या फिर वह आपने  अंतस्थ में आवरणित., विनम्रता को प्रदर्शित कर रही हो। पूछो इस व्योम मंडल में, अदृश्य उस दैवीय शक्ति से कि.... आमोद और प्रमोद के, मध्यांतर की ... अभिव्यक्ति का आधार क्या है...? क्या संचार की ... इतनी बड़ी श्रंखला में छिपे , अनगिनत शब्द समूह , इसे प्रदर्शित करने में , असफल है...? एकांत का वास ग्रहण कर ...

पाती आयी पाती आयी

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प्राची से दिनकर की एक किरण  पृथ्वी पर आकर फैल गई स्वर्णिम स्याही छिटक गई  प्रभात का संदेशा लाई  पाती आई पाती आई तरु तरुवर फिर से झूम उठे  धरती पर हरियाली छाई पुष्पों की डाली अंगड़ाई प्रकृति का संदेशा लाई पाती आई पाती आई  खलिहानो में शोर मचा गेहूं की बाली लहराई सरसों के फूलों की सुगंध बसंत का संदेशा लाई पाती आई पाती आई श्वेत गौर शशि की काया उदयाचल पर फैल गयी दिव्यपुंज की धुतिमा धूमकेतु का संदेशा लाई पाती आई पाती आई पवन लहर ने तन को छूकर मन को शीतलता पहुंचायी संग सुगंध कमलिनी की अधरो की लाली बन मुस्काई पाती आई पाती आई उलझे केशो की अलके बन घटा नयन पर छा गईं  कलाईयों के कंगन खनक उठे हाथो की मेंहदी महक उठी पाती आई पाती आई