समर्पण
प्रेम समर्पण है यदि कर सको तो करो।
प्रेम अग्नि है यदि जल सको तो जलो।।
व्यर्थ में प्रीत बदनाम करते हो क्यों।
आकर्षण को आसक्ति कहते हो क्यों।।
प्रेम यदि है तुम्हारा राधिका की तरह।
विरह सागर में डूबी गोपियो की तरह।।
तो चलती डगर में भटकते हो क्यों।
एक हृदय को विभक्त सौ बार करते हो क्यों।।
खुद की तुलना मीरा से करने लगे।
सूर्य के साम्य स्वयं को कहने लगे।।
छोड़ साहस दुनिया से डरते हो क्यों।
संदेह ईश्वर के होने पर करते हो क्यों।।
विष का प्याला यदि पी सको तो पियो।
बन सको यदि समंदर तो तुम बनो।।
मात्र बूंदों में जीवन पाते हो क्यों।
आकर्षण को आसक्ति कहते हो क्यों।।
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