तब टूटता है मौन

सकुचायी वाणी मन मे एक टीश भरे,
फिर भी अधरो को खींच हृदय विदीर्ण किये,
कंचुक मे थर्राती लोहित की बूंदे ,
समर्पण पर भी ना जाने क्या शेष रह जाता है ।
जो शिखा पकड़ भूमि पर घसीटा जाता है।।
 बोलो ऐसी परिस्थिति पर चुप रहेगा कौन...?
 तब टूटता है मौन....

पितृ प्रेम में इठलाती,
 मां के आंचल में छुप जाती।
 पुष्पों का भी भार लगे जिस को भारी,
 आज उदासी जीवन की छुपाती।।
 नैनो का नीर सूखकर चिपक गया कपोलो पर।
  प्रहार किया जाता हर बार मेरी भावनाओं पर।। 
बोलो ऐसी परिस्थिति पर चुप रहेगा कौन...?
 तब टूटता है मौन.....

कितने अभ्यस्त हो मिथ्या वाचन में,
मेरी उदारता को मूर्खता समझ लेते हो,
 यह निश्छल प्रेम है जो चुप कर जाता है ,
कोई गणना नही तुम्हारे सारे अपराधो की।
 फिर भी सीमाये पार करते हो धृष्टता की।।
 बोलो ऐसी परिस्थिति पर चुप रहेगा कौन.....?
 तब टूटता है मौन....

 अभंगुर पीड़ा बन गई तुम्हारी प्रवृत्ति।
करो ना वहीं पूर्व सी प्रणय निवृत्ति।।
 हृदय विदारक स्वर के प्रहार।
 उपयोग मात्र का ही करते हो व्यवहार।।
 अब नहीं सहा जाता यह विरह ताप।
मेरे जीवन को बना दिया तुमने अभिशाप।। 
 बोलो ऐसी परिस्थिति पर चुप रहेगा कौन.....?
 तब टूटता है मौन.....

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