मध्य की अवस्था

क्या कभी होगा,
उस व्याकुलता का उद्धार।
जो प्रथम और अंतिम कड़ी के,
मध्य बनी हुई है......
या यूं ही,
अतृप्त अवस्था में,
भटकती रहेगी
सहस्त्र वर्षों तक.......

अचेतन जड़ता भरे ,
चक्षुओ की प्रतीक्षा का अंत••
संभव हो सकेगा,
या मनुकाल का साक्षी,
बना चंद्र मेरे निस्सार जीवन की भी....
अगली पीढ़ी को गवाही देगा।

कुंठा और तीक्ष्ण अवस्था के मध्य,
जो सामंजस्य है।
उससे प्रमोद कहूं....?
या अहर्ष?
अब तो सारी स्थितियां...
दुविधा के घेरे में खड़ी 
विलाप कर रही है ।
क्योंकि वह शब्द हीन 
होने के साथ-साथ ,
संज्ञा हीन भी हो गई है।

जब जब इस कालजई,
विद्युत रेखा की गर्जना सुनती हूं।
ऐसा जान पड़ता है ,
मानो वह इस वीभत्स कालखंड से,
अपने क्रूर होने का ,
प्रतिघात ले रही हो ......
या फिर वह आपने 
अंतस्थ में आवरणित.,
विनम्रता को प्रदर्शित कर रही हो।

पूछो इस व्योम मंडल में,
अदृश्य उस दैवीय शक्ति से कि....
आमोद और प्रमोद के,
मध्यांतर की ...
अभिव्यक्ति का आधार क्या है...?
क्या संचार की ...
इतनी बड़ी श्रंखला में छिपे ,
अनगिनत शब्द समूह ,
इसे प्रदर्शित करने में ,
असफल है...?

एकांत का वास ग्रहण कर ,
हृदय और मन के ,
अविरल भाव को ,
विसर्जित करने के सिवा .....
और कोई अन्य मार्ग भी तो नहीं.. ।।।।।
मात्र एक अंतिम प्रयास ,
उसी करुण पुकार का ,
जिसे सुन तुम सदैव बेचैन हो उठते थे।।।।।।

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