गोविन्द

पुनीत चित्तवृत्ति की भावना पुनीत है।
आपके स्पर्श से पतित भी पुनीत है।।
कालिमा के मध्य मे सूर्य सा प्रकाश हो।
निर्मलता के मंच पर प्रथम पात्र आप हो।।
श्रेष्ठ की श्रेष्ठता में अतुलनीय आप हो।
शब्द ही नहीं है वह जिन शब्दों से बखान हो।।

आपकी लेखनी में स्वयं वाग्देवी का वास है।
और मृदु वाणी में श्री कृष्ण का निवास है।।
द्वेष और ईर्ष्या के बंधनों से मुक्त हो।
प्रेम और नेह की भावना से युक्त हो।।
आप समय से नहीं समय आपके बद्ध हो।
दिनकर से भी अधिक तेजवान आप हो।।
 
आपके समक्ष तो चंद्र दोषपूर्ण है।
गुण और कलाओं से आप परिपूर्ण है।।
स्यामंतक मणि सा आप में प्रकाश हो।
कांटे भी आपके पथ पर पुष्पो के समान हो।।
ज्ञान और विवेक का अनुपम स्वरूप हो।
अनुराग और उत्कर्ष का अद्वितीय रूप हो।।


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