करुण बेला

आ गयी है करुण बेला,
 परिणय के अवसाद की••••••

अरुणोदय था हुआ,
 जिसका कालांतर के पूर्व।
 हो रही परिमेय श्वासें,
 जिसकी अब परिपूर्ण।।
 सांध्य की कालिमा का,
 हो रहा आघात।
शून्य होती जा रही ,
प्राणअग्नि ताप।।
छा रही है घोर बदली,
 हृदय पर विषाद की••••••••!
आ गई है करुण बेला परिणय के अवसाद की••••••••


 परिनिर्णय हो चुका ,
हमारे पाणि अंत का।
समय है अब आ चुका ,
मृत्यु के परिग्रहण का ।।
प्रारंभ की सिंदूर रेखा,
 एक ईप्सा कर रही।
 अंततोगत स्पर्श पाने की,
 मनोरथ कर रही।।
मेरे तुम्हारे धीर और अधीर के,
 परिप्रेक्ष्य की•••••••••‌!
आ गई है करुण बेला परिणय के अवसाद की•••••••••


 आज पुनः केश मेरे सुमन,
सुसज्जित तुम करो।
जितनी ॠतुयें छूटी तुम बिन,
सभी सानंद उपस्थित करो।।
 पद्मप्रसून, पुष्परज लेपित ,
चंदन सी शीतलता।
 कंठबेल,कर्णकुसुम,कंगन,
मेहंदी की कांतिक्ता।।
तिरोधन कर वेदना का,
अनुराग के अवधान की••••••••!
आ गई है करुण बेला परिणय के अवसाद की••••••••••


हिय करुणा में व्यापा है,
तुम बिन कौन सुने इसकी।
 गतायु होने को आया ,
अब कहां बची अभिलाषा किसकी।।
अब एहलौकिक जीवन गाथा को,
जिज्ञासा से कौन कहे।
 एकात्म हो गई दो चेतनाये,
 तो समास की एषणा कौन करें।।
 विभावरी को छट जाने दो,
 आने दो किरण सूर्य की••••••••!
आ गई है करुण बेला परिणय के अवसाद की••••••••

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