दहेज एक कुप्रथा
हाय क्या हुआ आज यह छा गई त्रासदा आंगन में...!
जिस आंगन की वह शोभा थी आज पड़ी निर्जीव है वो,
चढ़ गई शूली पर आखिर क्यों ?
निर्गुण प्रतिमा बन कर जिसने जीवन का विस्तार किया।
एक शर्त के खातिर जिसने जीवन का निस्तार किया।।
शालीनता की प्रतिमूरत है, करुणा का भाव है वह।
लज्जा जिसकी पलकों पर घुंघट ही जिसका गहना है।।
नब्जो को टटोलता फिर कोई क्या शेष बचे हैं प्राण अभी ?
कैसे निष्ठुर है लोग यहां जो तोले जीवन को धन से !!
नारी का रूप ही दुर्गा है नारी का रूप ही काली है।
नारी से ही जग का जीवन है नारी ही जग कि पालक है।।
पर समझे ना इसको कोई समझी जाती है वस्तु कोई।
जिसने आंचल में छुपा लिया वह मां भी नारी रूपा है ।
फिर नारी का अपमान करो तो कैसे मां के पूत हो ,
क्या तनिक नहीं करुणा हृदयातल में जो नारी का सम्मान करो।
क्या तनिक नहीं देवत्व तुममे जो देवी समझो नारी को।
वेदो सी गाथा है जिसमें पुराणों सी जिसमें शोभा है ।
सतीत्व है जिसमें सीता सा द्रौपदी के जैसी क्षमता है।।
कान्ति है जिसमें हीरे सी सोने के जैसी दृढ़ता है ।
उस नारी को कुछ समझो समझो उसके अनुराग को।
सम्मान करो उस नारी का जो जन्मदात्री है जग कि।।#yqbaba
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