प्रेम अवधूतिका
मैं इन लौकिक संबंधों से परे एक अलौकिकता हूं ,
मैं तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं......
विरक्त हो इन सामाजिक बंधनों से,
तोड़कर इन परंपराओं के बंधन को।
मानवता की परिकल्पना हूं,
मैं तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
मन को अनियंत्रित करे जो दुर्भाव,
संकोच और घुटन का प्रभाव।
इन प्रकोपो की प्रचंडता हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
निज प्रीत कर्मो की संलग्न,
मोह और देह से विरक्त।
इस सृष्टि मे अनुराग की अरविता हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
मै रमी हूं इन दुकूलनियों मे,
आकाश की वैभवमयी विराटता मे।
संसार के वैमनस्य की कटाक्षता हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
मै खनकती चूड़ियों का अनुराग हूं,
मै महकते गजरे का राग हूं।
मै अरुण सिन्दूर की लालिमा हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
मुझसे विरक्त कुछ भी न संसार मे,
मै रमी कृष्णवाणी के सार मे।
हर हृदय मे बसी प्रेम विभूषिता हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
भक्ति और प्रीत के मध्य का प्रमाद हूं,
मैं मधुर संगीत की तान हूं।
मैं खग मृग की वाणी की मधुरता हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
शांत और निर्मल सरिता का कूल मे,
वृक्ष लताओं और महकते फूल में।
मयंक की शीतल श्वेत चंद्रिका हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
मैं पारिजात के रंग में,
इन मतवाले मयूरो के संग में।
झूमते लहराते पुष्पों की वाटिका हूं,
मैं तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
मेरे स्पर्श से पाषाण भी सजीव हो जाता है,
मैं मुस्काऊ तो रोता हुआ भी खिलखिलाता है।
मैं व्यथा और संताप पर कालिमा हूं,
मै तुम्हारे प्रेम की अवधूतिका हूं।।
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