श्वेत मोती सी मै तो संवरने लगी हूं
तेरे चमकीले नैनों में ढलने लगी हूं,
श्वेत मोती सी मै तो सवरने लगी हूं......
दूर बगिया में जो एक कली खिल रही थी।
देख रांहे एकाकी निशा मिल रही थी।।
पीछे से पर्वतों के है बुलाता कोई।
राग सावन के है गुनगुनाता कोई।।
मैं भी स्वर में स्वर को मिलाने लगी हूं ,
श्वेत मोती सी मैं तो सवरने लगी हूं.......
देता अधरों से छूकर निमंत्रण कोई।
तब ना रहता है खुद पर नियंत्रण कोई।।
आसमानी सा परिधान धारण किए ।
मंद सी मस्त मुस्कान अग्रसारण किए।।
मैं भी अब अकारण मुस्कुराने लगी हूं ,
श्वेत मोती सी मै तो सवरने लगी हूं......
समीरण की छुअन से लगते हो तुम।
निर्झरिणी में निर्मल से बहते हो तुम।।
रेत पर नाम लिख कर मिटाती रही।
कल के सपनों का घरौंदा बनाती रही।।
बैठकर तट पर शशि को तकने लगी हूं,
श्वेत मोती सी मै तो सवरने लगी हूं.......
गर्मियों की शीतल सी शाम हो तुम।
सर्दियों का गुनगुना सा घाम हो तुम।।
बंद नैनों में तुम ही तुम समाए रहे।
बनके काली घटा आसमा पर छाए रहे।।
मैं भी बारिश के संग-संग बरसने लगी हूं,
श्वेत मोती सी मैं तो सवरने लगे हूं.......
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