पन्ने मत पलटना
मत जाना उस पुराने किताबखाने में,
जहां धूल से सनी...
कुछ किताबे रद्दी होने को है।
पहुंच ही गए हो तो,
पन्ने मत पलटना,
नहीं तो समय के बल से पड़े....!
घिसे हुए शब्द,
फिर से सजीव हो उठेंगे।
उनमे अभी है कुछ पुरानी यादें,
जो तुम्हारे स्पर्श से,
सिसकियां ले चीख पड़ेंगी....
और वह चंदन की धूप,
जिसके धुंयै से बनती आकृति....,
सदैव एक उम्मीद को आसरा देती थी!
मत छूना उस धूपदानी को।
मटमैली हो चुकी,
वह झीना श्वेत चादर
जिस पर सुप्त पड़ी स्मृति की सलवटे
पुनः जागृत हो जायेंगी.....
और वह पुष्पपात्र...!
जिसमे वर्षो से मुरझाये हुए,
पलाश कुसुम नयन मूंदे पड़े है...
तुम्हारे कस्तूरी गंध से
पुनः तरुणाई पा लेंगे।
खिड़की को ढांके
इस आवरण को,
मत स्पर्श करना...!
नही तो
अतीत के चलचित्र
बीती बातों का,
सब हाल कह देंगे।
वह घाव जिसपे वर्षो से....
वर्तमान की पट्टी बांधती आ रही हूं,
उसे और विषैला कर देंगे।
मेरे कक्ष की सज्जा,
करने का स्वप्न है तुम्हारा।
यहां मात्र स्मृतियों के कुछ भी नही,
यदि शेष चेतना चाहते हो,
यहां मात्र बिंब के कुछ भी नही।।
बस धमनियो मे शेष शोणित बूंदे,
इस अस्थि चर्म को साधे है।
जबकि हृदयगति और श्वासें ,
सब साथ ले गयी क्षण-क्षण मेरा...
एक दिवस स्वर ये फूट पड़ा,
कि मिलन मात्र,
यदि मन का है तो.....!
ये आंखे ये बाते,
ये कंचन अधर मुस्कान भरी,
सब मिथ्या है, सब आलंबन है।
तो जल जायेंगी ये आंखे,
जो तुझे देखने को तरस गयी।
जल जायेंगी ये बांहे,
जो तुझे लिपटने को व्याकुल रही।।
जल जायेगी ये ज्योत्सना,
जो अधरो की कनक मुस्कान बनी।
जल जायेगी हाथो की मेंहदी,
जो अनुरागी बन चटक चढ़ी।।
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