लुप्त होना है तुम मे मुझे
भीड़ में जिस भांति
लुप्त हो जाता है
एकाकी हृदय
वैसे ही लुप्त होना है
तुम मे मुझे
अनात्म हो भौतिकता से भिन्न
प्रणय के नवीन लोक में
पूर्वोत्तरीय आकाश में
पिंड बन स्थिर होना है
चंद्रमा की शीतलता
मार्तंड की सुर्ख लालिमा
ताजमहल की उज्जवल कांति
हमारे प्रेम को प्रदर्शित करती है उतना
जितना सागर की गहराइयों में छुपे मोती की खोज
तुम बढ़ाना चाहो तो बढ़ता है प्रेम
घटाना चाहोगे तो घट जाएगा प्रेम
पता नहीं क्या है
जो मेरे रुधिर से सींचता है
पलाश या कनेर
प्रेम में महकता है
अत्यंत दुर्लभ होता है
व्यक्त करना
फिर भी यह ह्रदय
तुम्हारे लिए ही धड़कता है
सांध्य वेला पर जुगनुओ का झुंड
भोर में खिली कुमुदिनी
हिमबिंदु से जिस भांति गुलमोहर ढकता है
अपने रक्तिम पुष्पों को
वैसे ही प्रेम के अनावरण से
ढकना है तुमको
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