हे! प्रकृति के अवधूत सुनो
हे!प्रकृति के अवधूत सुनो,
जीवन को जीने का मन है....
बनकर खग मृग इन निर्झरियों में,
कौतूहल करने का मन है।
जीवन को जीने का मन है.....
नभ की बहती धाराओं में ,
वर्षा बन बहने का मन है ।
जीवन को जीने का मन है.....
बन शिरीष का पुष्प कोई,
माला में गुंथने का मन है ।
जीवन को जीने का मन है....
ऊंची सी कोई अट्टालिका पर ,
बैठ कूकने का मन है ।
जीवन को जीने का मन है.....
रति की पायल का बन नूपुर,
छम छम कर बजने का मन है।
जीवन को जीने का मन है.....
चंदन सा शीतल बन करके,
हरि मस्तक सजने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
पवन वेग के झोंकों से इन इठलाती,
शाखाओं के कोपल बनने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
तट सरिता का छूने वाली खाकर हिलोर,
मदमाती धारा बनने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
शशि मुख मंडल को देख-देख,
खुद पर इतराने का मन है।
जीवन को जीने का मन है.....
गोधूम की सुनहरी बालियों पर,
तितली बन उड़ने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
बनकर बसंत का नव गायन,
स्वर वाचन होने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
सावन की कजरारी बन बदली,
धरा से मिलने का मन है।
जीवन को जीने का मन है.....
बनकर कागज की कश्ती,
नन्हे बच्चों के हाथों से बहने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
शरद ऋतु में ओस बूंद बन,
कमलिनी पर ठहरने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
हिम श्रृंगों की श्वेत चादर पर,
बन धूप बिखरने करने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
रजनी के घोर अंधकार में,
बन आशाओं का दीप जलने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
देवालय के पावन मृदंग संगीत में,
स्वर गुम्फित होने का मन है।
जीवन को जीने का मन है......
किसी वृक्ष की छाया बन,
पंथी को शीतल करने का मन है।
जीवन को जीने का मन है....
बनकर मनमोहन की मुरली,
श्रवणेद्रियों को सुख देने का मन है।
जीवन को जीने का मन है....
हे! प्रकृति के अवधूत सुनो,
तेरे अंक में बैठकर बस खो जाने का मन है।
जीवन को जीने का मन है ......
बस कुछ भूली बिसरी यादों को,
फिर से जीने का मन है।
जीवन को जीने के का मन है....
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