सुन न मांझी
सुन न मांझी.......
तेरी पतवार असंख्य बूंद पानी को पीछे धकेलती है।
तभी तो आगे बढ़ पाती है।।
आश्चर्य में पड़ता है,मन! क्या है ?
जो तेरी नाव को उबारे हुए हैं।
इन चिड़ियो की कौतूहल को संभाले हुए है।।
सूर्य कैसे उदित होता है?
कैसे ढल जाता है?
इस रहस्य को बनाए हुए है.....
हर दिन गुजरता है तभी तो वर्ष बन पाता है।
यह प्रकृति स्वास देती है तभी तो मनुष्य जी पाता है।।
एक अंकुर से कितना बड़ा वृक्ष बन जाता है।
एक एक शब्द से साहित्य रच जाता है।।
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