तुम कहते हो मै सुंदर हूं
तुम कहते हो,
मैं सुंदर हूं....
यह प्रेम की अभिव्यक्ति है,
या मन की वासना।
काम के पाश में बंधकर निहारते हो मेरी देह,
और इसे संज्ञा संतोष की देते हो,
फिर भी संतोष नहीं मिलता,
हृदय में वही उद्विग्नता क्यों मचलती है।
यदि यह संबंध प्रेम है,
तो मैंने प्रेम में अथाह सुख भोगा है,
फिर शांति क्यों नहीं.......
मैं सुंदर हूं इसलिए प्रेम है,
या प्रेम है इसलिए सुंदर हूं।
कुछ समय पश्चात.......
जब ढल जाएगा यौवन मेरा,
क्या तब भी सिर्फ इच्छाएं तृप्त करोगे?
यह मेरे कंपकपाते हाथों का सहारा भी बनोगे।
तब प्रेम की अनुभूति का.....
सच्चा अर्थ समझ आएगा,
तब काम और वासना से विमुक्त होगे।
यदि अश्लीलता प्रेम है,
तो प्रेम में श्रद्धा और पूजा कैसी,
क्या अधूरे रह जाएंगे स्वप्न बालाओं के?
जिन्होंने कभी दर्पण नहीं देखा.....
क्या उन्हें प्रेम का रसास्वादन कभी ना होगा?
जो सौंदर्य की परिपाटी पर खरी नहीं उतर पाती।
या देखेगा कोई मन,
तन पर गौर ना करेगा....
कामायनी की श्रद्धा सुंदरी परी ,
मनु के मन मे घर करती हैं...!
कारण मात्र सौंदर्य,
यदि सुंदर ना होती श्रद्धा...!
तो क्या धरती आज भी मनुष्य हीन होती...?
ना होता सृजन,
क्या सौंदर्य काम का पर्याय है.....
यदि हां.....!
तो क्यों.....?
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