इंद्रधनुष के सप्तरंगों में विलीन होना चाहती हूं
संधि कर मै और तुम कि हम होना चाहती हूं.........
इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं.......
शिशिर की छनती हुई धूप में,
कोहरे की सौंधी धुंध में!
बिन मौसम बरसात होना चाहती हूं......!
इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं.......
अचेतन हृदय का निमंत्रण,
द्वीपों के पुजं में विलीन हो गया..
टकराकर त्वरित लहरों से,
त्रस्त हो लौट आया....!
छोड़ इन औपचारिक पत्रों को...
श्वासो का निमंत्रण भेजना चाहती हूं.......
इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं......
नीलमणि की ऊष्म गंध,
पंखुड़ियों पर ठहरी शीकर ,
सिकुड़ता हुआ पलाश वृक्ष,
मंदाकिनी की गुनगुनी रेत..।
इन सब का अनुराग तुम्हें सौंपना चाहती हूं.......
इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं.......
बुलाता है ! तुम्हें मोर पंख का सांवला रंग,
प्रतीक्षा में नीले पड़ चुके शुष्क अधर,
आंखों को घेरे विरह के स्याही...।
इन सब की प्रतीक्षा का अंत करना चाहती हूं.......
इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं........
लहरें उतावली है तुम्हें छूने के लिए...
बातें दबी है तुम्हें बताने के लिए,
निदाघ के धूमकेतु को......
यमुना तट का निमंत्रण है...!
कदम की इठलाती शाखाएं,
मुरली के व्याकुल स्वर,
प्रेम की पराकाष्ठा को.....
नेह का निमंत्रण है......!
इस चित्त के उद्गार का प्रतिकार करना चाहती हूं......
इंद्रधनुष के सप्त रंगों में विलीन होना चाहती हूं....
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