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अब प्रेम का नाम मत लेना..

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मैं तुम्हे पाना नही चाहती बस  दूर से यूं ही तुम्हे प्रेम करना चाहती हूं तुम्हे पा लूंगी तो प्रेम न कर सकूंगी तुम्हे पाकर मैं तुम्हे खो दूंगी तुम्हारे छल भरे व्यवहार से आहत हो  तुमसे घृणा करने लगूंगी मैने कभी तुम्हे छुआ नहीं  पर फिर भी तुम्हारे अधरो का स्पर्श महसूस करती हूं आज तुम्हारे नाम की मेहंदी से रंगा है हाथों को पर उस रिक्तता को कोरा ही छोड़ दिया जो तुमने कभी छोड़ी थी मैं तुम्हारे लिए बस श्रद्धा और दया की पात्र हूं प्रेम की नही और होना भी नही चाहती  क्योंकि तुम्हारा प्रेम प्रवंचना है और मैं उस पर आरूढ़ हो धोखे की यवनिका में छिपना नही चाहती मैं तुम्हारे विरह में जीना चाहती हूं क्योंकि वह आनंद है जो देह की परिपाटी पर नही हृदय की कसौटी पर कसा जाता है एक चिर आनंद जो तुम्हारे ठिठोली करते चंचल नेत्रों  की अरुणता और मेरे गजरे में गूथे बेला और पलाश क्षण प्रतिक्षण अनुभव करते है  उसे शिथिल नही पड़ने देना  दया ही बहुत है पर अब दोबारा कभी प्रेम का नाम मत लेना अब मैं तुम्हारा प्रेम नही चाहती बदले में  तुमसे दूर रहकर अश्रु जल से शहस्त्र श्रद्ध...

////////हिंदी साहित्य आलोचना संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य/////////🌺🌺🌺🌺🌺

चीटीं से लेकर हाथी पर्यन्त पशु, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यन्त मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्र पर्यन्त जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत सभी पर कविता हो सकती है।’’ – आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (रसज्ञ रंजन (1920)) ⇒ किसी भी अवस्था के अनुकरण को नाट्य कहते है।’’  – श्याम सुन्दर दास (रूपक रहस्य) ⇒ ’’हमें अपनी दृष्टि से दूसरे देशों के साहित्य को देखना होगा, दूसरे देशों की दृष्टि से अपने साहित्य को नहीं।’’ – आचार्य शुक्ल (चिंतामणि भाग-2) जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रस दशा कहलाती है।’’ – आचार्य शुक्ल (रस मीमांसा) ⇒ ’सर्वभूत को आत्मभूत करके अनुभव करना ही काव्य का चरम लक्ष्य है। – आचार्य शुक्ल (काव्य में प्राकृतिक दर्शन) ⇒ जिस कवि में कल्पना की समाहार-शक्ति के साथ भाषा की समास-शक्ति जितनी ही अधिक होगी, उतना ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा। यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से वर्तमान ’’थी। – आचार्य शुक्ल (हिन्दी साहित्य का इतिहास) ये (घनानन्द) साक्षात् रस-मूर्ति और ब्रज भाषा के प्रधान स्तंभों में है। प्रेम की गूढ़ अन्तर्दशा का ...

हिंदी में प्रथम

🇮🇳🇮🇳अल्पिका अवस्थी 🇮🇳🇮🇳 1. हिन्दी के प्रथम कवि - सरहपा 2. हिन्दी भाषा के लिए हिन्दी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया- शरफुद्दीन यजदी 3. हिंदी की प्रथम रचना -श्रावकाचार 4. हिंदी का प्रथम महाकवि - चन्दबरदाई 5. हिंदी का प्रथम महाकाव्य-पृथ्वीराज रासो 6. आधुनिक खड़ीबोली के प्रथम कवि- श्रीधर पाठक  7. खड़ीबोली हिंदी के प्रथम महाकवि- अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध 8. खड़ीबोली हिंदी का प्रथम महाकाव्य- प्रियप्रवास 9. हिंदी का प्रथम मौलिक नाटक- आनन्द रघुनन्दन  10. हिंदी की प्रथम आत्मकथा- अर्धकथानक 11. हिंदी की प्रथम दलित आत्मकथा- अपने अपने पिंजरे 12. हिंदी की प्रथम जीवनी- दयानंद दिग्विजय  13. खड़ीबोली के प्रथम कवि- अमीर खुसरो 14. हिंदी का प्रथम रिपोर्ताज- लक्ष्मीपुरा 15. हिंदी की प्रथम कहानी - इन्दुमती 16. हिंदी की पहली वैज्ञानिक कहानी- चन्द्रलोक की यात्रा 17. हिन्दी का प्रथम गघकाव्य - साधना  18. हिन्दी की प्रथम ऐतिहासिक कहानी- राखी बंद भाई  19. छायावाद का प्रथम काव्य संग्रह- झरना 20. हिन्दी की प्रथम अतुकांत रचना- प्रेम पथिक  21. खड़ी बोली गघ की प्रथम रचना- चन्...

सप्तपदी

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सात वचन सात जन्मो तक निभाऊंगी देकर खुशियां सारी तुमको  सारे गम सह जाऊंगी  तुम से जुड़े हर रिश्ते को  मैं अपना रिश्ता बनाऊंगी  सात वचन सात जन्मो तक निभाऊंगी कठिनाइयों को तुम तक पहुंचने से पहले  मेरा सामना करना पड़ेगा  पर एक बात सोच लो  मैं जो रूठी तो तुम को भी मनाना पड़ेगा  यूं ही हंसते हंसते यह जिंदगी बिताऊंगी  सात वचन सात जन्मों तक निभाऊंगी प्रीत की इस डोर में कभी न कोई गांठ आए सुख की इस लहर में दुःख की कभी ना भवर आए दुख की चट्टाने हो कितनी भी प्रबल  हमें देख वह टूट जाए आपको अपना स्वाभिमान बनाऊंगी  सात वचन सात जन्मो तक निभाऊंगी

स्वार्थपरक

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काश ! कभी प्रयास किया होता , मेरे भी अंतर्मन को खंगालने का । छिपी है कई वेदनायें, जो सदैव ही, निर्झरिणी के भांति, अश्रुपात किया करती है। जहां मात्र तुम्हारे लिए, निश्छल प्रेम है। परन्तु ! मैं तुम्हारे लिए मात्र, तुम्हारी चादर से अधिक कुछ भी नहीं। जिसे तुम आवश्यकता पड़ने पर,  ओढ़ लेते हो। जब भी तुम्हारी देह में..... शिशिर की चुभन, और कपकपाहट प्रवेश करती है... वैसे ही कामवासना, और इच्छा पूर्ति के लिए, मेरा उपयोग मात्र है.. तुम्हारे जीवन में। क्या दर्पण भी स्वीकारता है तुम्हें ? तुम्हारे इस दोहरे चरित्र को, क्या तुम्हारे नेत्र, जलहीन हो गये है? या तुम्हारा ह्रदय करुणाहीन, क्योंकि मेरी निर्मलता भी, तुम्हें पिघला ना सकी। क्या मानवता की परिपाटी पर, तुम कभी खरे उतर पाओगे। क्या दिनकर के साम्य, तुम कभी स्वयं को, कह पाओगे....? नागफनी सी तुम्हारी वाणी, कितना प्रतिछेदित करती है  हृदय को....। विलाप करती मेरी वेदनायें , मेरे की कन्धो पर सर रखकर, मौन पड़ जाती है.....! क्योंकि धैर्य और, संवेदनाओ का विकल्प मात्र , भी मै हूं.........  कुछ अनबुझी पहेलियां  रुधिर में....... ...

तुमसे 'तुम तक'

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सुनो !  सांझ की जब अंतिम  सिन्दूरी रेखा नभ मे शेष बचे तब छोड़कर अपनी दिनचर्या को समेट लाना सम्पूर्ण दिन का सार  अपनी प्रेममयी आंखो मे  किसी पंचसितारे रेस्टोरेंट मे नही तुम्हारे हांथो से सींचे बगीचे मे बैठकर हम सोंधी चाय की चुस्कियां लेंगे और खो जायेंगे हम दोनो  नेत्रो के उस स्वप्निल प्रवाह मे जहां अनन्त से अनन्त तक के सफर मे  मात्र समर्पण हो गहरे समुद्रो मे अठखेलियाँ करेंगे  मै तुम्हारी मधुबाला और तुम मेरे  मनोज कुमार बन जाना  अपने हाथो से गजरा बुन  बांधना मेरे बालो मे सुनो हमे ताजमहल नही  तुम्हारे साथ प्रेम मंदिर जाना है उड़कर प्रेमगंध में सनी ब्रज धूल  जब हमारे बदन पर लिपटेगी तब अमरत्व पायेगा हमारा प्रेम  जहां बैठ यमुना के तट पर  तुम्हारे कंधे पर सर रखकर  बंसी की मधुर तान और  प्रेम की अनुभूति को सार्थक करना है सावन की पहली बारिश की कुछ बूंदे तुम अपनी पलकों मे समेट लाना शांत और शीतलता की अविरल ध्वनि में  खो जाऊंगी मैं तुम्हारे निर्मल  अनुमोदन मे और मुस्कुरा दिया करना तुम मेरी गुलाबी सा...

बिन ब्याह 'सुहागन'

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अजी सुनते है..... बाजार से चूड़ियां लिए आना  क्या ये अधिकार मात्र  सप्तपदी मे बाध्य है मेरे सजल नयन भी  मुस्कुरा पड़ते है  जब तुम्हारी प्रेम छवि  इनमे उभर आती है पूर्ण हो जाता है  मेरा षोडश श्रृंगार  जब कपाल तुम्हारे  अधरो का स्पर्श पाता है.... ग्रंथि,भंवर,सिन्दूर भराई ये तो औपचारिकताएं है एक प्रेमिका भी निर्वहन करती है परन्तु बन्धनमुक्त रिवाजो का मै भी सजाती हूं महावर बिछुये  अन्तस की भावनाओ से तुम बनते हो मेरे मोहन और मै तुम्हारी विक्षिप्त मीरा... क्या रूढ़ियों से आबद्ध  उस संस्कार से श्रेष्ठ नही विष्णुपदी सा प्रवाहित ये अनुराग  तुम संगम का तट  और मै अविरल धारा  आकर बार-बार स्पर्श करती हूं तुम्हारे नलिन पदो को और श्रृंगार लतिका का पुंज हो जाती हूं.... आयने से भी छिपकर  संवारती हूं केशो को अरुण रेखा कि कल्पना मात्र से दौड़ जाती है दामिनी अंग प्रत्यंग मे मेरे अवशेषो को जब तुम्हारे हस्तकमल स्वंय अमरतरंगिनी मे विसर्जित करेंगे  तब पाऊंगीं पूर्णता इस प्रेम के अमरत्व की.......