तुमसे 'तुम तक'





सुनो ! 
सांझ की जब अंतिम 
सिन्दूरी रेखा नभ मे शेष बचे
तब छोड़कर अपनी दिनचर्या को
समेट लाना सम्पूर्ण दिन का सार 
अपनी प्रेममयी आंखो मे 
किसी पंचसितारे रेस्टोरेंट मे नही
तुम्हारे हांथो से सींचे बगीचे मे
बैठकर हम सोंधी चाय की चुस्कियां लेंगे

और खो जायेंगे हम दोनो 
नेत्रो के उस स्वप्निल प्रवाह मे जहां
अनन्त से अनन्त तक के सफर मे 
मात्र समर्पण हो
गहरे समुद्रो मे अठखेलियाँ करेंगे 
मै तुम्हारी मधुबाला और तुम मेरे 
मनोज कुमार बन जाना 
अपने हाथो से गजरा बुन 
बांधना मेरे बालो मे

सुनो हमे ताजमहल नही 
तुम्हारे साथ प्रेम मंदिर जाना है
उड़कर प्रेमगंध में सनी ब्रज धूल 
जब हमारे बदन पर लिपटेगी
तब अमरत्व पायेगा हमारा प्रेम 
जहां बैठ यमुना के तट पर 
तुम्हारे कंधे पर सर रखकर 
बंसी की मधुर तान और 
प्रेम की अनुभूति को सार्थक करना है

सावन की पहली बारिश की
कुछ बूंदे तुम अपनी पलकों मे समेट लाना
शांत और शीतलता की
अविरल ध्वनि में 
खो जाऊंगी मैं तुम्हारे निर्मल 
अनुमोदन मे
और मुस्कुरा दिया करना
तुम मेरी गुलाबी साड़ी की तारीफ में


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