स्वार्थपरक
काश !
कभी प्रयास किया होता ,
मेरे भी अंतर्मन को खंगालने का ।
छिपी है कई वेदनायें,
जो सदैव ही,
निर्झरिणी के भांति,
अश्रुपात किया करती है।
जहां मात्र तुम्हारे लिए,
निश्छल प्रेम है।
परन्तु ! मैं तुम्हारे लिए मात्र,
तुम्हारी चादर से अधिक कुछ भी नहीं।
जिसे तुम आवश्यकता पड़ने पर,
ओढ़ लेते हो।
जब भी तुम्हारी देह में.....
शिशिर की चुभन,
और कपकपाहट प्रवेश करती है...
वैसे ही कामवासना,
और इच्छा पूर्ति के लिए,
मेरा उपयोग मात्र है..
तुम्हारे जीवन में।
क्या दर्पण भी स्वीकारता है तुम्हें ?
तुम्हारे इस दोहरे चरित्र को,
क्या तुम्हारे नेत्र,
जलहीन हो गये है?
या तुम्हारा ह्रदय करुणाहीन,
क्योंकि मेरी निर्मलता भी,
तुम्हें पिघला ना सकी।
क्या मानवता की परिपाटी पर,
तुम कभी खरे उतर पाओगे।
क्या दिनकर के साम्य,
तुम कभी स्वयं को,
कह पाओगे....?
नागफनी सी तुम्हारी वाणी,
कितना प्रतिछेदित करती है
हृदय को....।
विलाप करती मेरी वेदनायें ,
मेरे की कन्धो पर सर रखकर,
मौन पड़ जाती है.....!
क्योंकि धैर्य और,
संवेदनाओ का विकल्प मात्र ,
भी मै हूं.........
कुछ अनबुझी पहेलियां
रुधिर में.......
आज भी मंथन कर रही है
ढूंढ रही है...
अपने उपयोग का ,
वास्तविक अर्थ....।
जब रह जाती है कुछ ,
गगन पर छाई लालिमा,
और धुंधला पड़ जाता है....
दर्पण का प्रतिबिंब,
तुम्हारे आगमन की,
ललक और घृणा...
एक साथ उमड़ती है...।
आंचल के छोर से....
गीले नयनो को दबाकर,
अनिच्छा से होठ,
दबाकर तुम्हारा अभिवादन
करती हूं........।
परन्तु कभी द्वेष,
और कपट से,
तुम्हारी तरह,
तुम्हारे साथ छल
नही करती...!
क्योंकि....?
मै प्रेम करती हूं...
दिखावा नही करती.....।
सरकार यह सर्व यह सर्वस्व श्री कृष्णार्पित
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