बिन ब्याह 'सुहागन'

अजी सुनते है.....
बाजार से चूड़ियां लिए आना 
क्या ये अधिकार मात्र 
सप्तपदी मे बाध्य है
मेरे सजल नयन भी 
मुस्कुरा पड़ते है 
जब तुम्हारी प्रेम छवि 
इनमे उभर आती है
पूर्ण हो जाता है 
मेरा षोडश श्रृंगार 
जब कपाल तुम्हारे 
अधरो का स्पर्श पाता है....

ग्रंथि,भंवर,सिन्दूर भराई
ये तो औपचारिकताएं है
एक प्रेमिका भी निर्वहन करती है
परन्तु बन्धनमुक्त रिवाजो का
मै भी सजाती हूं महावर बिछुये 
अन्तस की भावनाओ से
तुम बनते हो मेरे मोहन
और मै तुम्हारी विक्षिप्त मीरा...

क्या रूढ़ियों से आबद्ध 
उस संस्कार से श्रेष्ठ नही
विष्णुपदी सा प्रवाहित ये अनुराग 
तुम संगम का तट 
और मै अविरल धारा 
आकर बार-बार स्पर्श करती हूं
तुम्हारे नलिन पदो को
और श्रृंगार लतिका का
पुंज हो जाती हूं....

आयने से भी छिपकर 
संवारती हूं केशो को
अरुण रेखा कि कल्पना मात्र से
दौड़ जाती है दामिनी अंग प्रत्यंग मे
मेरे अवशेषो को जब तुम्हारे हस्तकमल
स्वंय अमरतरंगिनी मे विसर्जित करेंगे 
तब पाऊंगीं पूर्णता
इस प्रेम के अमरत्व की.......

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