भागीरथी! हे भागीरथी

भागीरथी है ! भागीरथी
हे सुरसरिता ! हे ध्रुवनंदा
हे देवपगा ! हे देवनदी
भागीरथी हे ! भागीरथी
अक्षुण्ण प्रवाह शीतल शम्बरं 
नभ से कलकल का स्वर प्रवाह
अंचित गिरीश जब भागीरथ 
अंगीकार शिव जटा बंधी 
अक्षुब्ध भाव निर्मल स्वभाव 
अच्छित्र तेजमय नीर निर्वाह 
संकोचरहित प्लवक गढ़े 
 निज जीवन के प्रभात स्वप्न 
 प्रियवंद गढ़े श्वर की प्रतिमा 
निकट तट रेणुका पास
मुनियों की प्रत्याशा फिर भी 
निरभिलाष स्पर्श मात्र
हे देवपगा तुम विष्णुपगा 
प्रेमोन्मत्त निरवशेष करो 
हे निर्झरिणी निर्जर काया 
हे निरामई तुम भोग निरीह
तर्पण अर्पण मन बुद्धि का 
प्रेम समर्पित सारा मन का 

श्वेत पुष्पों से सुशोभित माल कंठ बंधा हुआ 
परिधान सुंदर स्वर्णमई देह से लिपटा हुआ 
श्रृंगार तेरा कर रहे व्योम से भूखंड तक 
अमिट है अभिज्ञान तेरा धरती के सातों खंड तक 
अशुद्ध मन की प्रवृति पर रूप तेरा प्रचंड है 
पवित्रता की मूल हो बात ये अखंड है 
गोविंद के चरणों बसी हे! नदीश्वरी तुम शस्य पुंज हो
करते भ्रमण जहां ब्रजनंदनंदन तुम वही तो कुंज हो
करुणेश्वरी मंदाकिनी तुम प्रेम से अभियुक्त हो 
संसार की द्वेषयुक्त भ्रांतियों से विमुक्त हो 
इस पृथा पर प्रेम और पुनीत का आधार हो
 हे त्रिपगथा हे सुरसरि तुम चेतना का सार हो 
मोक्ष प्राप्त कर सके जो तेरे चरणों का प्रावित्र है 
मात्र एक नीर तेरा इस धरा पर पवित्र है

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