●●मेरे कौन हो तुम●●
मेरी चेतनाओ में मौन हो तुम,
क्या कहूं कि मेरे कौन हो तुम।
प्रिय करुणा के अवतार तुम्ही,
जीवन के हो मधुगान तुम्हीं ।
जीविका के हो आधार तुम्हीं,
प्राणों में श्वास समान तुम्हीं।।
प्रतिनव प्रीत के प्रतीक्ष्य हो तुम,
क्या कहूं कि मेरे कौन हो तुम......
विधु सी शीतल कांतिमय मुस्कान,
जो प्राणवायु बन हृदय में समाती।
पंथो में निसमय रह जाती,
वह किरीटिनी कुछ कह जाती।।
मेरे रोष में आनंद हो तुम,
क्या कहूं कि मेरे कौन हो तुम.....
इंदीवर के पाश में बंधी,
अभीपुष्पित कौस्तुभ से अनुवासित।।
मंजुल अमल पुष्ट कलेवर,
स्वेतांबर से सुवासित।।
मेरे तिमिर में दिवकिरण हो तुम,
क्या कहूं कि मेरे कौन हो तुम.....
जो भाल आलोक सूर्य जैसी,
दिगंश समूह क्षितिज जैसी।
मधुप गुंजार स्वर जैसी,
कंचन कुसुम पावस जैसी।।
इस प्रकृति के सुकुमार हो तुम,
क्या कहूं कि मेरे कौन हो तुम....
कुछ चंद्रिका कुछ सविता,
ओजपूर्ण वह तत्वज्ञपूर्ण तुम कोई हो चंद्रहास।
पद्माकर जैसे तुम पुनीत,
उत्तम कोटि मृदु सुबास।।
मै तृणवत परिपूर्ण हो तुम,
क्या कहूं कि मेरे कौन हो तुम....
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