■●■●■सती सुलोचना■●■●■

 कर रही बैठ श्रृंगार षोडस, 
दर्पण मे दिखा नवरूप प्रत्यक्ष। 
कुछ धूमिल करने वाली आँधी ,
तभी गगन मे मड़रायी।।
बिजली कौंधी, बादल गरजे ,
आतंक देख दैवियता का।
मन ही मन मे कुछ घबरायी,
तभी आकाश अंगार हुआ।।
ज्वालामुखी जैसे फटा हुआ ,
ऐसा भीषण विस्फोट हुआ ।
खुले नेत्र रह गये खुले,
दर्पण के भी सौ खण्ड हुये।।
खुल गये केश बिखरी चूड़ी,
 माथे की बेंदी भूमि गिरी ।
आँचल साड़ी का सरक गया,
इंगुर माथे का उजड़ गया।।
मन डोल उठा सतवन्ती का,
रौंदा गजरा केशो का।
वह अकुलायी वह घबरायी ,
कुछ सहमी कुछ झल्लाई ।।
धरती पर तभी कुछ आके गिरा, 
मानो पहाड़ का कोई शिरा ।
झट दौड़ी वह छोड़ सज्जा ,
देखी पति की पड़ी भुजा ।।
विश्वास नही जो दृश्यमान हुआ,
मन ही मन कुछ संदेह हुआ ।।
बोली ऐ हांथ बता पति के,
सत्य है या आया जाल रचा करके।
वह योद्धा है वह तपस्वी है,
वह शूरवीर वह कर्मवीर ।।
निज कर्मो के ही द्वारा, 
वह इन्द्रजीत कहलाते है ।
मै मानू कैसे तू सच है ,
वह हारे रण मे विजय दिलाते है।।
वह दायी भुजा है लंका की,
मै उनकी नारी सुनयना हूं।
निज कर्मो पर विश्वास मुझे ,
मै पतिव्रता प्रमीला हूं।।
वह एक सहस्र भूमियों को, 
एक साथ ध्वस्त कर सकते है।
यदि वह चाहे तो ,
पाताल शुष्क कर सकते है।।
जिनके तपसी कर्मो से ,
ब्रम्हांड समस्त डोल उठे।
मन्त्रोचार की शक्ति से,
मठ देवी का विह्वल उठे।।
 मैं कैसे स्वीकार करू इसको ,
कि तुम भुजा मेरे स्वामी की हो।
 यदि सत्य हो तो दृष्ट नहीं,
 बात प्रमाण की हो ।।
तभी धरा से उठा हाथ ,
भूमि पर सत्य लगा लिखने ।
सब संशय होने लगा दूर ,
सत्य ही सत्य लगा दिखने।। 
मैं भुजा मेघनाथ की हूं ,
लंकापति पुत्र इंद्रजीत की हूं।
 क्यों घबराती हो सुलोचना,
 में हटकर पीछे कायर ना बना ।।
रणभूमि में प्राण गवाएं है, 
मुझ में वीरों के विशिख समाए हैं।
 तुम आतुर हो किन हाथों ने,
 मेरे हाथों को नष्ट किया।।
 राघव के छोटे भाई ने,
 मुझको समर में परस्त किया।
 शीश मेरा ले गए उठा,
 देखेंगे विज्ञानी शक्ति लगा ।।
उनको अब भी यह सशंय है,
 कहीं जीवित मैं फिर से हो ना उठा ।
हाहाकार मचता हुआ,
 सुनाइ एक ओर दिया।
 कुछ कपिगण शव को लाते हुए,
 जिसका है सर कटा हुआ ।।
मानो हिमखंड झुका हुआ.....!
 दौड़ने को पैर बढ़ते ही नहीं,
 जबकि जंजीरों से बंधे नहीं ।।
फिर भी पीछे खींचे कोई,
 मानो वज्र प्रहार करें कोई ।
शव लंका के भीतर आया,
चहुंओर घना अंधकार छाया ।।
सोने की लंका उजड़ गई ,
अश्रुओ से नगरी सारी डूब गई ।
खो दिया लंका ने युवराज अपना ,
जैसे खोया समस्त सौंदर्य अपना।।
उमड़ पड़ी  सारी नगरी ,
अंतिम दर्शन पाने को।
 अपने बलशाली योद्धा से ,
कुछ ज्ञान युद्ध का पाने को।।
उस झुंड बीच में दौड़ गई ,
प्रियतमा प्रीतम की ओर गई ।
निशब्द हुई निष्प्राण हुई ,
स्थिर हो अपलक निहारती रही।।
 मानो सागर सारा सूख गया,
एक सूर्य असमय डूब गया।
 चंदा से उसकी चांदनी गई ,
जल बिन मछली निर्जीव हुई ।।
कहने को कोई शब्द नहीं ,
स्वर सुनने को कोई रहा नहीं।
 उसने मन में संकल्प किया,
 अपना स्वरूप प्रचंड किया ।।
मैं यदि सतवंती नारी हूं,
 अपने प्रियतम को प्यारी हूं।
 तो खंडित शव ना जलने दूंगी,
 राघव को अस्वस्थ ना रहने दूंगी।।
 वह शिविर राम के पहुंच गई ,
पर्दे की सारी ओट गई।
 जो दृष्टि गड़ायी लक्ष्मण ने ,
और देखा द्वार के कपिगण ने।।
एक नारी विध्वंसित रूप लिये,
आंखों में करुणा शेष लिये ।
बिलखते हुए आ रही चली ,
मानो दुःख से भरी गगरी ।।
किस मन्सा से यह आयी है ,
या निज प्राण शक्ति गवाई है ।
भूमंडल चकित चहुंओर हुआ ,
कंपित प्रकाश धरा में हुआ।।
 राघव के समीप पहुंच करके,
 दोनों कर संधि निवेदित हो करके।
 हे राघवेंद्र , हे रघुनायक,
 हे सियाराम , हे जग पालक।
हे अखिल ब्रह्म , हे जनमन रंजन,
हे सुहृदयी, हे दुःख दर्प भंजन।।
संशय ना करिए देख मुझे,
 मैं इंद्रजीत की नारी हूं।
चकित न हो कृपया देख मुझे,
मैं आज स्वयं से ही हारी हूं।।
मेरा तो सब कुछ नष्ट हुआ ,
अब शेष बची ना शक्ति कोई ।
भयभीत न हों कृपया देख मुझे,
 मैं नहीं विध्वंसक हूं कोई।। 
निज पति का खंडित सर लेने,
 मैं इस शिविर तक आ पहुंची ।
मात्र चाहत प्रिय शीश की है ,
जिस कारण मैं यहां आ पहुंची ।।
कृपया करके दीजिए मुझे पति का शीश।
 सुनकर यह बात सावधान हुए सब कीश।।
 बोले यह षड्यंत्र है दशानन का।
 जो उपयोग कर रहा प्रमीला का।।
 तभी या सुनकर बोल उठा विभीषण ।
यह पुत्रवधू सुनयना है नहीं षड्यंत्र कोई भीषण।। 
रघुराई ने संकेत से,
 सर लाने का आदेश दिया। 
उस सतवंती नारी के आगे, 
सर अपना वही झुका दिया ।।
बोले ऐ देवी तुम महाशक्ति हो ,
तुम सुरा में सुधा धारा हो ।
तुम जैसी सतवंती नारी से ,
तो टिका ब्रह्मांड सारा है।।
 तभी कीश समुदाय ने,
 दिया वहीं पर टोंक ।
कि यदि भुजा लिख सकती है, 
इसमें है कुछ संकोच।।
 यदि बात यही सत्य है तो ,
हंसकर के सर दिखला दे ।
यदि कुलवधू सतवंती है तो,
तो निज सत्य से यह करवा दें।।
 रो पड़ी प्रमीला रानी तब ,
कि बात पतिभक्ति पर आई है।
 अब तो हंसना होगा तुमको, 
वरना जग में मेरी हंसाई है।।
 जाए ना लाल चूड़ियों की ,
चाहे सारा ब्रह्मांड जले।
 जाए ना लाज सुनयना की ,
चाहे धरती आज फटे ।।
हंसकर दिखला दो नाथ अब,
 समय हुआ विपरीत।
 सत्य प्रमाण मांगता अब,
 यही जगत की रीत।।
 लगा गगन को फाड़ कर ,
हंसने घनानंद का शीश।
 सबको तब विश्वास हुआ,
 जब हंसता देख शीश।।
 मान बढ़ा प्रमीला का, 
जब सत्य अटल अखंड हुआ।
 मानो सारे भूमंडल का ,
चमत्कार कुटी में प्रकट हुआ।।
 हाथ बढ़ाकर सती ने,
 आंचल में सर को छुपा लिया।
 भीगी आंखों के पानी से ,
अंतिम प्रेम अभिषेक किया।।
 उधर राज श्मशान में ,
चंदन का ढेर तैयार हुआ।
 संधि कर सर की देह में,
 अंतिम श्रंगार विशेष हुआ।।
पति का सर गोदी में धर कर,
 अग्नि के भीतर प्रवेश लिया ।
नभ के देवी देवताओं ने ,
पुष्पों का वर्षण विशेष किया।।
 कहा देवी तुम धन्य हो.....!
 धन्य तुम्हारा प्रेम धीर,
 ऐसी सती प्रमीला को,
 झुकता है यह शीश।।

🌺🌺धन्यवाद 🌺🌺
_Alpika Awasthi✒

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