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●●●●निज जीवन की सारी तृष्णा कर समाप्त रहना होगा●●●●

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दृग में उलझी सी वल्लरिया, उर्मिल हो इठलाती खुद पर।  दिनकर की धुतिमा का प्रणव भाव, छिटका देती रेशमी किरण।।  रहता है किंतु अवसाद सदा, निर्दय को तम के छटने का।  जिनके अंतर में सुप्त पड़ी, निश्चय की कोई दीपशिखा।।  ज्योतिपुंज को खोने पर, उनको कब अनुशय होगा।  निज जीवन की सारी तृष्णा, कर समाप्त रहना होगा।।  करुणा पुंजों के क्रूर व्याल, का भी आघात सहना होगा।  कितने आंसू कितनी वेदना, क्योंना हो भीतर स्थित।।  यदि प्रेम किया अग्नि से तो, फिर ताप शिखा का सहना होगा।  अर्पण करने की हो क्षमता, पाने की कोई चाह नहीं।। ब्रह्मांड समाया हो भीतर, लघु क्षिता अंतस्थ नहीं।  दहन कर अभिलाषाओ का, होकर अनघ रहना होगा।।  निज जीवन की सारी तृष्णा, कर समाप्त रहना होगा.....

■●■●■सती सुलोचना■●■●■

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  कर रही बैठ श्रृंगार षोडस,  दर्पण मे दिखा नवरूप प्रत्यक्ष।  कुछ धूमिल करने वाली आँधी , तभी गगन मे मड़रायी।। बिजली कौंधी, बादल गरजे , आतंक देख दैवियता का। मन ही मन मे कुछ घबरायी, तभी आकाश अंगार हुआ।। ज्वालामुखी जैसे फटा हुआ , ऐसा भीषण विस्फोट हुआ । खुले नेत्र रह गये खुले, दर्पण के भी सौ खण्ड हुये।। खुल गये केश बिखरी चूड़ी,  माथे की बेंदी भूमि गिरी । आँचल साड़ी का सरक गया, इंगुर माथे का उजड़ गया।। मन डोल उठा सतवन्ती का, रौंदा गजरा केशो का। वह अकुलायी वह घबरायी , कुछ सहमी कुछ झल्लाई ।। धरती पर तभी कुछ आके गिरा,  मानो पहाड़ का कोई शिरा । झट दौड़ी वह छोड़ सज्जा , देखी पति की पड़ी भुजा ।। विश्वास नही जो दृश्यमान हुआ, मन ही मन कुछ संदेह हुआ ।। बोली ऐ हांथ बता पति के, सत्य है या आया जाल रचा करके। वह योद्धा है वह तपस्वी है, वह शूरवीर वह कर्मवीर ।। निज कर्मो के ही द्वारा,  वह इन्द्रजीत कहलाते है । मै मानू कैसे तू सच है , वह हारे रण मे विजय दिलाते है।। वह दायी भुजा है लंका की, मै उनकी नारी सुनयना हूं। निज कर्मो पर विश्वास मुझे , मै पतिव्रता प्रमीला हूं।। वह एक सह...