●●●●निज जीवन की सारी तृष्णा कर समाप्त रहना होगा●●●●
दृग में उलझी सी वल्लरिया, उर्मिल हो इठलाती खुद पर। दिनकर की धुतिमा का प्रणव भाव, छिटका देती रेशमी किरण।। रहता है किंतु अवसाद सदा, निर्दय को तम के छटने का। जिनके अंतर में सुप्त पड़ी, निश्चय की कोई दीपशिखा।। ज्योतिपुंज को खोने पर, उनको कब अनुशय होगा। निज जीवन की सारी तृष्णा, कर समाप्त रहना होगा।। करुणा पुंजों के क्रूर व्याल, का भी आघात सहना होगा। कितने आंसू कितनी वेदना, क्योंना हो भीतर स्थित।। यदि प्रेम किया अग्नि से तो, फिर ताप शिखा का सहना होगा। अर्पण करने की हो क्षमता, पाने की कोई चाह नहीं।। ब्रह्मांड समाया हो भीतर, लघु क्षिता अंतस्थ नहीं। दहन कर अभिलाषाओ का, होकर अनघ रहना होगा।। निज जीवन की सारी तृष्णा, कर समाप्त रहना होगा.....