●●बहता आकाश ●●

नजरिया बदल रहा था, जिसका कोई अस्तित्व ना था ,वह भी धाक जमाए मनमानी किए जा रहा था।प्रोफेसर टंडन एक बहुत ही विलासी स्वभाव का मनुष्य है, जो विज्ञान का प्रोफेसर है ,खुटकपुर के दर्शन विश्वविद्यालय में। जोकि खुटकपुर के पाँच मील की दूरी पर है। खुटकपुर एक असहाय गांव है ,जो कि प्रोफेसर टंडन के द्वारा सताया हुआ, प्रौढ़ अवस्था पर पहुंच गया है। खुटकपुर की हवा प्रोफेसर टंडन के इशारों पर बहती हैं ।शायद यह गांव भी दरिंदगी का मारा हुआ है। प्रोफेसर कि गांव में एक बड़ी हवेली है,जिसमें उसका परिवार निवास करता है। उस हवेली में सुरेखा यानी उसकी पत्नी और उसके दो बेटे बड़ा लड़का सोमेश्वर टंडन, और छोटा लड़का करुणेश टंडन और एक बेटी सरस्वती रहती है ।और इसके अलावा प्रोफेसर का छोटा भाई जिग्नेश और उसकी पत्नी लक्ष्मी भी उसी घर में रहते हैं। जिनका एक बेटा रूद्र है।जो कि करुण स्वभाव का मालिक है, जिसका नाम ही उसके आचरण का व्याख्यान करता है। वह एक सद्भावना रखने वाला व्यक्ति है। रुद्र की उम्र इक्कीस वर्ष है।वह बी.ए. द्वितीय वर्ष में पढ़ता है। उसे विश्वविद्यालय में जहां उसके बड़े पिता( ताऊजी) प्रोफेसर टंडन पढ़ाते हैं ।
रुद्र सामाजिक दृष्टिकोण सज्जन पुरोषो में आता है,जिसके विचार उसके एकात्मक व्यक्तिव के परिचायक हैं।जो एक अनावरण पुस्तक की भांति है,जिसकी समीक्षा करना व्यर्थ है। अपने पिता द्वारा उपहार में प्राप्त स्कूटर से विद्यालय जाता है ।उसे अपने बड़े पापा की मोटर गाड़ी की आवश्यकता नहीं है ।क्योंकि उसका मानना है, कि गरीब की छीनी हुई रोटी और किसान से वसूल किए हुए अनाज की बद्दुआ नहीं लेनी है। रुद्र साहित्य की भांति उज्जवल प्रवृत्ति वाला मनुष्य है। दोहरा चरित्र रखना उसके प्रकृति में नहीं है।
रुद्र की मां लक्ष्मी सिर्फ नाम की लक्ष्मी नहीं वरन कर्म से भी लक्ष्मी है। आंगन में लगी तुलसी लक्ष्मी के ही हाथों से जल पाकर तृप्त होती है। मुख से मधुर स्वर में जब वह संध्या वंदन गाती है, मानो सरस्वती देवी ने सातों स्वर उसकी हवेली में बिखेर दिये हो। रुद्र के पिता जिग्नेश पेशे से वकील हैं। जो कि पूरी ईमानदारी से अपने पेशे का निर्वाह करते हैं। प्रोफेसर टंडन की बेटी सरस्वती तो अनर्गल बातें करने वालों में से एक है। जो कि अपनी मां की अनुयाई है। उन्हीं के इशारों पर कठपुतली की भांति नृत्य करती है , पर मन की खराब नहीं है। टंडन का बड़ा बेटा सोमेश्वर जो कि अपने पिता के ही कदमों पर चलता है। और छोटा बेटा सिर्फ नाम से ही करुणेश है। करुणा तो उसके हृदय तल छू भी नहीं गई। गांव में 'छप्पन' नाम का एक बेवड़ा रहता है, उसे बेवड़ा ही कहते हैं। था तो पियक्कड़ पर वास्तव में वह परमार्थिक था। क्योंकि कहते हैं... नशा यथार्थ का परिचायक होता है, बस यही कहता था टंडन का घड़ा भरने में कुछ बूंदे ही शेष बची हैं। पर रुद्र उसे कभी भी अनदेखा नहीं करता था। और ना ही कभी उसकी बातों को सामान्य समझता था। क्योंकि रूद्र अपने आत्मविश्वास पर गांव में परिवर्तन ला सकता है ।इसलिए उसे छप्पन की बातें बेकार नहीं लगती । 

रुद्र आज मंगलवार की बाजार में कुछ साहित्यिक किताबें लेने गया था। गांव के बाहर एक चार बीघे का चौकोर मैदान है। जिसके आसपास जंगल है , जिसमें कुछ आम के और आंवले के पेड़ लगे हैं ।और उसी मैदान में जो तीन चबूतरे जिसमें कपड़ों की दुकानें सजती हैं,और अन्य कई दुकानें पूरे मैदान भर में लगाई जाती है । जिसमें एक दुकान किताबों की लगती है। जो दुबे जी की है,जो कि रूद्र को सबसे अधिक भाती है। दुबे जी की दुकान पर पहुंचकर....अरे ! दुबे काका क्या हमारी डोज लाए हो। (सामने लकड़ी की मेज पर रखी किताब की तरफ इशारा करते हुए ) दुबे जी कहते हैं..... वह रही तुम्हारी डोज उत्सुकता से रुद्र हाथ बढ़ाकर किताब उठाता है।जो कि आठ रोटियो जितनी मोटी है। लगभग दो से ढाई सौ पन्नों की एक सामाजिक कुरीतियों , तानाशाही के विनाश पर आधारित है।
कुछ खड़खड़ की आवाज सुनकर....... रूद्र पीछे की तरफ मुडता है । तो देखता है कि एक मोटर गाड़ी धूल उड़ाती हुयी काफी दूर से चली आ रही है..... दुबे जी की पीछे से आवाज आती है, अरे !लो आ गए। भाई... रुद्र मैं तो चला। पर काका.. किताब का मूल्य तो बता दीजिए । रुद्र तुमसे क्या भाव करना,जो मर्जी हो दे दो। पर काका आप ही तो अपनी बात रखिये...। सत्रह रुपये हुए...  रूद्र अपनी कमीज की जेब से बटुआ निकालता है जिसमें कुछ फुटकर  पैसों के साथ दस-दस की चार नोटे पड़ी हुई है। जिसमें से वह सत्रह रुपये निकाल कर दे देता है। गाड़ी  दुकान के नजदीक आकर रुक जाती है ।और उसमें से अनजान लड़की का निकलना होता है... तभी दुबे आगे बढ़कर मेरी 'बच्ची' सफर कैसा रहा। कोई तकलीफ तो नहीं हुई । रूद्र वहां से निकलने की सोचता है, तभी दुबे काका कहते हैं.... अरे! रुद्र यह मेरी बहन की बेटी गोरी है। इससे मिलो अभी-अभी विलायत से पढ़ कर आई है। यह सुनकर रूद्र कुछ आश्चर्य  में पड़ जाता है!  क्योंकि विलायत से लौटने के बाद गौरी में विदेशी होने के कोई प्रमाण नहीं मिल रहे थे। उसके मुख पर भारतीय  स्त्रियों वाली करुण भावना , शालीनता मुखरित हो रही थी। वेशभूषा का अंदाज भी देशी ही था। गौरी शांत स्वभाव की प्रतिमा है ,जिसका व्यक्तित्व चरित्रवान है । गौरी ने इंटरमीडिएट परीक्षा पास करने के बाद, आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चली गई थी। अब वह अपने मामा के घर छुट्टियां बिताने आई है। रूद्र गौरी की तरफ हाथ बढ़ाकर कहता है... हेलो गौरी!, गौरी हाथ जोड़कर "प्रणाम की मुद्रा" में" नमस्ते "इससे तो यह पक्का हो गया था।  कि वह अभी भी भारतीय संस्कारों वाली ही थी ।इसके बाद रुद्र भी अपने रास्ते की तरफ मुड़ता है।

 रूद्र घर पहुंचकर( उत्सुकता भरे स्वर में) माँ जरा यह किताब तो देखो पूरी की पूरी रामायण की छाया है ।
लक्ष्मी -अच्छा ऐसा क्या है?
रुद्र - समाज मैं फैली अराजकता को मिटाने का मूल मंत्र है इसमें ।
 अच्छा ! तू तो पता नहीं किन ख्यालों में गुम है.......
रात के आठ बज चुके है, सभी दस्तरखान पर आ चुके हैं। थालियां परोसी जा रही हैं। रूद्र पुस्तक के पन्ने पलटते-पलटते ही कुर्सी पर आकर बैठ जाता है ,और पुस्तक पढ़ते-पढ़ते ही भोजन करता है ।भोजन करने के उपरांत रुद्र अपने कमरे में पुस्तक ले कर चला जाता है। कमरे में एक चौकोर मेज है ,जिसके सामने एक लकड़ी की कुर्सी पड़ी हुई है ।मेज पर आठ-दस किताबे लगी हुई है, उसी से किनारे एक लाल उजाले वाली लालटेन लगी हुई है । जिसके प्रकाश से पूरा कक्ष प्रकाशमान हो रहा है ।रुद्र  कुर्सी पर बैठकर किताब पढ़ने लगता है,  पूरे इलाके में शांति छाई हुई है, घड़ी की सुई की आवाज कमरे में सुनाई पड़ रही है। लेकिन रुद्र की आंखें केवल किताब पर ही टिकी है। साहित्य प्रेमी जो है, और उसे महाभारत में अर्जुन का पात्र भी तो निभाना था। जम्हाई लेते-लेते अचानक घड़ी की तरफ देखा तो दो बज रहे थे,तब तक दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी........ रुद्र दरवाजे  की ओर गया ...!और दरवाजा खोला तो देखा ....उसकी मां (लक्ष्मी ) खड़ी थी । आप.......! हाँ.... मै क्यों ....?अभी तेरी रात नहीं हुई ।सो जा बेटा सोएगा नहीं तो मन अशांत रहेगा। अरे, मेरी प्यारी मां सो जाऊंगा ,तो सपने साकार कैसे करूंगा। सपने पूरे करने के लिए तो जागना पड़ता है ।और मां मेरे लिए कभी रात नहीं होती। अच्छा ठीक है....! अब सो जा बावले ।लक्ष्मी चली जाती है। रुद्र  दरवाजे बंद करके अपने बिस्तर पर लेट जाता है। और सोने की कोशिश करता है......और धीरे-धीरे उसे नींद आने लगती है, कि तभी नीचे कमरे से गाने की और घुंघरू की आवाज आती है । इस कोलाहल से रुद्र की नींद अचानक खुल जाती है, और वह उठकर नीचे वाले कमरे में जा कर देखता है ।तो उसे देखने को मिलता है कि प्रोफेसर टंडन शराब के नशे में फर्श पर पड़े हैं, और कुछ वेश्याओं की टोली नृत्य कर रही है ।रुद्र  यह सब देख कर बहुत क्रोधित हो जाता है ।पर करें भी तो क्या वापस आकर फिर से अपने कमरे में लेट जाता है,और सो जाता है। सुबह होती है ,पक्षियों के कौतूहल से रुद्र की आंखें खुल जाती है। और वह उठकर स्नान करने के पश्चात नीचे नाश्ते की टेबल पर आकर  बैठ जाता है,  कपाल पर तनाव है और दिमाक मे शोर शायद किससी गंभीर समस्या मे उलझा है। लक्ष्मी चाय लेकर आती है, चाय की प्याली रुद्र की तरह सरकाते हुए....... बेटा कुछ उदास है, क्या हुआ.....? रूद्र अपनी अचेतन मुद्रा टूटती है।( हड़बड़ाहट में) कुछ तो नहीं है ना मां......! और वह जल्दी जल्दी चाय की प्याली खत्म करके घर से कॉलेज के लिए निकल जाता है। 
तभी रास्ते में उसकी मुलाकात गौरी से होती है ।गौरी तुम कहां जा रही हो.....? गोरी..- मैं यहां पर जो कॉलेज है, दर्शन विश्वविद्यालय वहीं पर नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रही हूं ।अच्छा पर तुम वहां नौकरी क्यों करना चाहती हो.....!(विस्मय भरे शब्दो में) इसके पीछे क्या तुम्हारा कोई व्यक्तिगत निर्णय है, या फिर किसी और की इच्छा अनुसार यहां आई हो। एक्चुअली में यहां अपनी मर्जी से टीचिंग करना चाहती हूं। क्योंकि मुझे पढ़ाना काफी पसंद है। वाह...! यह तो अच्छी बात है खैर मैं भी कॉलेज ही जा रहा हूं ।अगर तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो। हां बिल्कुल ...!चलो.. दोनों कॉलेज के लिए निकल जाते हैं ।कॉलेज पहुंचकर देखते हैं गेट पर छप्पन बैठा हुआ है ।और कुछ ऊंचे स्वर में चिल्ला रहा था ।हाथ में गांजे की चिलम है ,जिसे व कुछ देर बोलने के बाद फिर से मुंह से लगा लेता है ।और एक दो सुटक लेने के बाद फिर से चिल्लाने लगता है ।उसके स्वर में उद्दंडता तो थी, परंतु सत्य की बूह आ रही थी ।उसकी उन्मानता सत्यार्थ की परिचायक थी ।उसको किसी से भी भय ना था,क्योंकि वह कहता था जाना तो है, ही पर जब जाऊं। तो तहलका मच जाए। वह उन्मुक्त विचारधारा का था । रुद्र को उसकी ये आदत बड़ी अच्छी लगती थी। रुद्र छप्पन के समीप जाकर उससे पूछता है ?क्या हुआ.....?" चंद्रशेखर आजाद " आज इतना भडके हुए क्यो हो....? ये टण्डन आज इसकी खैर नहीं ।(लड़खड़ाते हुए स्वर में) इसकी हिम्मत कैसे हुई ...?मुझे लात मारने कि मैं यहां बैठकर छात्र-छात्राओं की गणना ही तो कर रहा था। पता नहीं क्या समस्या थी इस टण्डन के बच्चे को निकले यह तो बताऊ। यह सारे पत्थर जोड़ कर रखे हैं ।एक-एक करके उसके सर पर मारूंगा ।तभी गौरी धीरे धीरे बोलो तुम प्रोफेसर के बारे में ऐसा क्यों बोल रहे हो। वह तो इतने अच्छे व्यक्ति हैं ।और एक शिक्षक भी और फिर तुम उनके बारे में ऐसा बोल क्यों रहे हो ......?अगर उन्होंने सुन लिया तो तुम्हारा वह क्या करेंगे ....!कृपया शांत हो जाइए ....!क्यों शांत हो जाऊ? मैं क्या डरता हूं... बड़े ही गंभीर स्वर में बोला ....उसकी आंखों में प्रतिकार की अग्नि प्रज्ज्वलित हो रही थी ।
 गौरी- रुद्र तुम ही संभालो कहीं ऐसा ना हो कि इसकी शामत आ जाए।
 तभी अचानक से पीछे से आवाज आती है क्या तमाशा हो रहा है...... तीनों पलटते हैं ,तो देखते हैं टंडन का बेटा अपनी कार से नीचे उतर कर बाहर निकलता है। तभी रुद्र फुसफुसाहट की आवाज में गौरी से कहता है। यह बड़े पापा का बड़ा बेटा सोमेश्वर है। चलो निकलो यहां से और वरना अभी इसकी बड़ी-बड़ी डींगे सुनकर तुम परेशान हो जाओगी। गौरी कहती है ,अरे नहीं ...! रुद्र ऐसा कुछ नहीं है वो मुझे तो सज्जन दिख रहे हैं ।
सिर्फ सज्जन दिखते हैं, और सज्जनता तो उनके व्यक्तित्व को छू कर भी नहीं निकली। गौरी वहीं पर खड़ी रहती है ।और रुद्र  कॉलेज के अंदर चला जाता है। और सोमेश्वर सामने से आकर गोरी से नमस्ते करता है।
 छप्पनदेखकर आश्चर्य में पड़ जाता है......! कि सूर्य पश्चिम से कैसे निकल आया। चलो कोई बात नहीं इसे अपनी सभ्यता की प्रदर्शनी लगा लेने iदो ।सोमेश्वर  गौरी से कहता चलिए मैं आपको पिताजी के प्रधानाचार्य  कक्ष तक ले चलता हूं । 
वह गौरी के साथ अंदर की तरफ प्रवेश करता है ,सभी सभी छात्र छात्राएं उसे देखकर रास्ते से हटने लगते हैं, और दृष्टि को धरती की तरफ केंद्रित कर लेते हैं। क्यों कि कोई भी उसके समक्ष आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ,सभी को ऐसा करते देख गौरी सोमेश्वर से प्रश्न करती है? कि ये लोग आपको देखकर इस तरह से व्यवहार क्यों कर रहे हैं। गौरी का ये प्रश्न सोमेश्वर  के मन में भेद खुल जाने की शंका उत्पन्न कर देता है । वह उसके इस प्रश्न से नीरव था। परंतु एकाएक सोचकर हड़बड़ी में कहता है। कि मैं शायद इन्हें पसंद ना हूं। इसलिए या फिर ये सब  मुझसे ईर्ष्या करते होंगे ।सोमेश्वर यह कह कर आगे बढ़ता ही चला जाता है ।और प्रधानाचार्य कक्ष तक पहुंच कर गौरी के साथ प्रवेश लेता है। प्रोफेसर टंडन अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ है, उसने अपने पैर सामने पड़ी मेज पर रख रखे हैं। तभी तभी सोमेश्वर आगे बढ़कर  कुछ आंख से इशारा करते हुए कहता है, पिता जी यह गौरी! यह हमारे गांव में नई आई है। और यह हमारे विद्यालय में पढ़ाने के लिए इंटरव्यू देने आई है। ओह! अच्छा गौरी आओ बैठो। सामने पड़ी कुर्सी पर गौरी बैठ जाती है ।उसे उस कुर्सी पर बैठता देख टंडन कहता है, गौरी तुम इतनी दूर क्यों बैठी हो यहां आओ इस कुर्सी पर बैठो आकर ।(अपने सामने पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए )गौरी कहती है। नहीं सर मैं ठीक हूं!  प्रोफेसर  टंडन उससे क्वालीफिकेशन की फाइल मांगता है ।।गौरी हाथ में टंगे बैग से फाइल निकालकर मेज पर रखती है, और प्रोफेसर की तरफ सरका देती है ।गौरी की आंखों में बड़ी उत्सुकता भरी है ,उसे आने वाले परिणाम की चिंता हो रही है। टंडन उन सभी डाक्यूमेंट्स को देखकर "गुड" कहता है । और कहता है ! तुम्हारी ही तरह तुम्हारा क्वालिफिकेशन भी काफी अच्छा है । प्रोफेसर की इस बात से गौरी थोड़ा सहम जाती है ।पर फिर से वह अपने मन पर नियंत्रण पाते हुये सोचती है, कि शायद व उसके चरित्र और गुणों का मूल्यांकन कर रहे हैं..... पर वास्तव में गौरी शुद्ध  स्वभाव और चरित्र वाली है। प्रोफेसर उससे कुछ सवाल पूछने की शुरुआत करता है। पहले तो वह कहता है ........की आपको देखकर ऐसा लगता है !मानो स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा मेरे समक्ष प्रस्तुत हो ।और एक बड़ी ही विचित्र हंसी हंसता है, जिसे देखकर  गौरी घबरा जाती है। पर फिर से टंडन खुद को संभालते हुए कहता है। चलिए मैं आपसे कुछ इंटरव्यू के तौर पर प्रश्न पूछता हूं, मेरा सवाल यह है कि आप दर्शनशास्त्र के बारे में क्या जानती हैं? उससे आपका क्या तात्पर्य है, अगर आप कक्षा में छात्रों को इसे पढ़ाएंगे तो आप कैसे समझाएंगी। दर्शन शास्त्र क्या है ....?
गौरी एक लंबी सांस लेती है ,तत्पश्चात  वह इन सारे प्रश्नों के उत्तर क्रमानुसार देती चली जाती है ।जिससे टंडन काफी प्रभावित होकर मेज पर हाथ से प्रहार करते हुए कहता है ..............।गौरी तुमने तो कमाल कर दिया ,तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम इस विद्यालय में अध्यापन कार्य के काबिल हो। क्योंकि उसे  प्रोफेसर टंडन के मंतव्य के बारे मैं कुछ भी ज्ञात ना होता है।
 टंडन सोमेश्वर से कहता है जाओ सोमेश्वर मैडम को उनकी कक्षा दिखा दो ।सोमेश्वर और गौरी जैसे कक्ष से बाहर निकलते हैं ,तो उन्हें सामने रुद्र खड़ा मिल जाता है ,रुद्र को देखकर सोमेश्वर के चेहरे पर एक अजीब सी चिढ़न दिखाई पड़ती है। पर रुद्र शांत स्वभाव की चेहरे पर मुस्कुराहट लिये गौरी से कहता है .........। गौरी कैसा रहा तुम्हारा इंटरव्यू ?
गौरी कहती है....बहुत अच्छा मुझे प्रधानाचार्य जी ने नियुक्त कर लिया है। अब से मैं रोज यहां पढ़ाने आ सकती हूं ।रूद्र खुशी से गौरी को बधाई देता है .........बहुत-बहुत बधाई तुम्हें गौरी !मैं तुम्हारे ही पास आ रहा था, चलो कोई बात नहीं तुम मुझे यही मिल गई। गौरी रुद्र से इंटरवल में मिलने को कहती है, और चली जाती है रुद्र अपनी कक्षा की तरफ चला जाता है ।और अपनी बेंच पर बैठकर कुछ सोचने लगता है, कि तब तक पीछे से आवाज आती है ।मिस्टर रूद्र ........कहां खोए हुए हो ।श्रद्धा तुम .....! हां मैं आजकल देख रही हूं, तुम बहुत व्यस्त रहने लगे हो ।और मुझे तो जैसे जानते ही नहीं। मुझे मंदिर में लक्ष्मी आंटी मिली थी ,मैंने पूछा उनसे तुम्हारे बारे में तो वह कहने लगी, हां पता नहीं वह आजकल बहुत ज्यादा देर तक पढ़ाई करता रहता है ।और कुछ किताबें भी लाया है, जिन्हें बाहुत देर रात तक पढ़ता रहता है। खाने पीने पर भी ध्यान नहीं देता ।और तुम तो जानते ही हो रुद्र में तुम्हारे घर नहीं आती। वरना मैं खुद तुमसे आकर मिल लेती........।
 श्रद्धा ऐसी कोई बात नहीं है ,और तुम तो मेरी काफी अच्छी मित्र हो ।थोड़ी व्यस्तता का तो रहना स्वभाविक है.....
 कक्ष के दरवाजे पर दस्तक देते हुए ...........!
"सुप्रभात "मित्रों मैं आपकी नयी कक्षाचार्या 
" गौरी गोयल "हूं ।कैसे हो आप सभी......? इतना कहते हुए गौरी का प्रवेश होता है।
 क्लास रूम के सभी छात्र स्टैंडअप होते हैं, और एक साथ सुप्रभात कहते हैं।
 गौरी कक्षा में अपना अच्छा स्वभाव और छात्रों के साथ मेलजोल स्थापित करती है। और रजिस्टर उठाकर बारी-बारी से छात्रों की उपस्थिति लेती है ।गौरी की उम्र छात्रों की उम्र से मेलजोल खाती है ,पर ज्ञान का दर्जा बड़ा होने के कारण व शिक्षार्थी नियुक्त हुई है ।लेकिन वह खुद को छात्रों का मित्र समझती है ......और उनके साथ मित्रों के जैसा ही व्यवहार करती है।
 इसलिए छात्रों के साथ दोस्ताना माहौल ही स्थापित कर रही है ।उपस्थित ले लेने के पश्चात व श्रद्धा से दर्शन शास्त्र की किताब मांगती है ,और श्यामपट्ट के सामने खड़े होकर विषय के अंतर्गत व्याख्यान प्रस्तुत करती है। कुछ देर तक पढ़ाने के पश्चात छात्रों से प्रश्न करती है कि जो वह समझा रही है ,अथवा पढ़ा रही है ।उनको समझ में आ रहा है ......और पढ़ाई के पाठ से संबंधित प्रश्न करती हैं ,कुछ विद्यार्थी सटीक उत्तर दे पाते हैं ।तब तक घंटा बजता है ,और वह से चली जाती है ।

उसके इस व्यवहार को देखकर रुद्र  मन में सोचता है,  कि गौरी ने उससे कोई बातचीत क्यों नहीं की। क्या वह उससे रुष्ट है। विद्यालय का पूरा दिन निकल जाता है गोरी रुद्र  से मिलने को कहती है परंतु आती नहीं। वह अकेला ही विद्यालय के मध्य में चौपाल में उसकी राह देखता रहता है। समय समाप्त होने के लिए  घर रवाना होता हैं स्कूटर स्टार्ट करता है ,और घर की तरफ जाता है। घर पहुंच कर देखता है ,गौरी खाने की मेज पर बैठी सभी के साथ भोजन कर रही है। यह देखकर वह आश्चर्यचकित हो जाता है, वह सोचता है कि अगर गौरी को उसके घर ही आना था, तो वह उससे भी तो कह सकती थी, उसे मेरे घर चलना है ..........!मैं खुद ही उसे ले आता।
प्रोफेसर टंडन और उसके दोनों बेटे भी साथ ही में भोजन कर रहे है। तभी रुद्र और अधिक विस्मय  में में तब पड़ता है,  जब ताऊ जी यानी प्रोफेसर साहब घर में काम करने वाले सुनीता काकी को........' अम्मा जरा सब्जी  देना कह कर संबोधित करते है'।  उनका बदला स्वभाव सोचने पर मजबूर कर देता है, क्योंकि सदैव नौकरानी कही जाने वाली सुनीता काकी को आज अम्मा शब्द से नवाजा जा रहा है।
 यह क्षण कुछ तो हास्यप्रद है , और कुछ भयावह भी क्योंकि यह आने वाले किसी बड़े संकट की तरफ इशारा कर रहा है । टंडन रुद्र  को देखकर कहता है आओ बेटा तुम ही बैठो। रुद्र  कहता ताऊजी मुझे भूख नहीं है,  और वैसे भी मैं मुह हांथ धुलने जा रहा हूं ,चलो कोई बात नहीं।
 रूद्र सुस्त मन से और बोझिल पैरों से सीढ़ियां चढ़ता हुआ अपने कमरे की तरफ जाता है। हाथ में पकड़ी हुई किताबों को मेज पर रख देता है, और बिस्तर पर लेट जाता है।कुछ समय  राहत की सांस लेने के बाद मुंह हाथ धुलता है और नीचे जाता है । तब तक गौरी जा चुकी होती है, और वह भोजन की मेज पर बैठता है ,लक्ष्मी उसे भोजन परोसती है, और उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहती है........ क्या हुआ कुछ परेशान सा लग रहा है। मैं जब कल मंदिर गई थी तो मुझे श्रद्धा मिली थी, वह तेरे बारे में पूछ रही थी हां मां उसने मुझे बताया था। कुछ नहीं मां...! प्रोफेसर साहब के कर्म मुझे भयभीत कर रहे हैं, वह गौरी को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।
 गौरी को प्रोफेसर साहब का सच नहीं ज्ञात है, जब उसे पता चलेगा तब तक देर ना हो जाए। मुझे इसी बात की शंका है, और उस वक्त मैं भी निशब्द हो जाऊंगा जब गौरी मुझसे यह कहेगी। कि रुद्र तुम भी चुप रहे ,और वह मुझे भी उसी श्रृंखला में ना रख ले ।
तुम चिंता मत करो रूद्र......... गांव की निर्मम दशा को देखकर वह खुद उसकी यह दशा करने वाले के बारे में जान लेगी ।क्योंकि खुटकपुर गांव अपनी दशा की कहानी स्वयं ही व्यक्त कर रहा है ।गांव की इस दशा और असहाय मजदूरों से हर कोई परिलक्षित है। इसकी पुष्टि के लिए कुछ समय ही पर्याप्त है, रूद्र भोजन करके बाहर चला जाता है........ और देखता है।

 कोटेदार के चबूतरे पर कुछ लोग थैला लिए बैठे हैं ।जो आज चार दिन से बराबर आ रहे हैं, पर उन्हें अनाज मिलना तो दूर ऊपर से कोटेदार रंगीलाल की अभद्रता भरी गालियां अवश्य ही पेट भर मिल जाती है। शायद वह बेचारे उसी से तृप्त हो जाते हैं ।रंगीलाल भी प्रोफेसर साहब का चमचा है ,उसे हर महीने चार कुंतल चावल और ढाई कुंतल गेहूं की बेईमानी करने को जो मिलती है।
 छप्पन तो अपने हुक्के की गुड़गुड़ाहट में ही विलीन है, आजाद शख्सियत का छप्पन  कभी खुद को परिस्थितियों का बंधुआ नहीं मानता,  अपनी मनमानी को जारी रखता है। और प्रोफेसर साहब के हर चमचे को बेझिझक जो मन में आता है बक देता है। यहां तक खुद प्रोफेसर साहब को भी मुंहतोड़ जवाब दे देता है।
 बिना कुछ सोचे जबकि उसके ऐसा करने से कई बार प्रोफेसर ने उसे बांधकर लाठी से पीटा भी है .......एक बार की पिटाई में तो उसने अपना एक पैर भी गंवा दिया था ।फिर भी निडर स्वभाव का स्वामित्व रखता है। कई लोग उसे ऐसा करने के लिए मना भी करते हैं। कि वह ऐसा ना करें जिससे उसको टंडन का प्रकोप सहना पड़े, पर वह कहता है ,टंडन मेरा बाप नहीं जो ,मैं उससे भयभीत रहूं ।उसका दिया नहीं खाता मैं तो बोलूंगा....?
 जो करना है कर ले । 
सामने से सफेद धोती और कुर्ता सर पर बनारसी टोपी पहने एक महाशय चले आ रहे हैं ..........।
साथ में एक नौकर सर पर छतरी ताने हुए हैं और दूसरा एक कागजों से भरा थैला पकड़े, सफेद पोशाक वाले साहब ने अपने दाहिने पैर की धोती के छोर को दाहिने हाथ से पकड़े, और बाएं हाथ में चमकीला चिकना बेंत लिए चले आ रहे हैं। वह बेंत इन बेचारे मजदूरों की हड्डियों के ऊपर मढीं पतली खाल को और पतला बनाने के लिए है। जो हक के लिए आवाज उठाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के दुर्बल शरीर को खदेड़ने के लिए है।
 उसको देखकर एकाएक सभी वहां से उठ उठ कर निराशा से खाली थैले को लेकर वापस जाने लगे। छप्पन कहता है........ अरे! धोबी के गधे को देखकर तुम लोग क्यों भागे जा रहे हो। इसकी क्या औकात भागो मत अपना हक लेकर ही जाओ।
 पर शायद किसी में इतना साहस ना था , कि वहां एक पल और रुकता यह महाशय गांव के मुखिया रामलाल ठाकुर है । नाम से तो रामलाल पर काम से यमराज लाल हैं , क्योंकि उनका बेंत यमराज के हाथ में लटके उस सर्प के समान है । जिसे वे मृत्युलोक से सभी प्राणियों के प्राण निकालने में प्रयोग में लाते हैं। तभी लोग उन्हें देखकर भयभीत होकर भाग जाते हैं। पर वह बेचारे करें भी क्या जब उनकी सारी जमीन यमराज लाल के पास करीब गिरवी पड़ी है ।और वह आजीवन गिरवी ही रहेगी, क्योंकि उसकी कोई समय अवधि नहीं है ।
और यह भी हो सकता है कि वह उनकी आने वाली पीढ़ी को भी नहीं मिल पाएगी........ । यह सब तभी बंद हो सकता है। जब खुटकपुर के जिले मऊ के कलेक्टर साहब के समक्ष प्रोफेसर टंडन की करतूतों का प्रमाण सहित काला चिट्ठा खोला जाए। और किसी में इतना साहस नहीं है ,जो टडंन के विपक्ष में बोल सकें। लेकिन प्रमाण अर्जित करने में जरूर प्रयासरत है ।
छप्पन ने रामलाल से कहा ........! और बताइए यमराज लाल कैसे आना हुआ  .उसकी इस बात से रामलाल आग बबूला हो गया और  दो बेंत छप्पन  की पीठ पर चिपका दिए। तीसरा उठाने ही वाला था, कि रुद्र सही समय पर पहुंचकर ,अरे! मुखिया काका आप भी क्या ऐसे लोगों को मुह लगाते है  इसकी क्या औकात कि आपका बेंत इसे छुए ।रुद्र ने मुखिया को यह मक्खन लगाते हुए छप्पन का बचाव किया ।
लेकिन फिर भी छप्पन बकता रहा, मुखिया कोटेदार की बाड़ी  में बने चौपाल में आकर बैठ जाता है। और उसका नौकर छतरी को बंद कर के नीचे जमीन पर बैठ जाता है ।और दूसरा नौकर थैले को मेज पर रख कर वह भी जमीन पर बैठ जाता है ।रूद्र को इन चमचों के साथ में समय व्यतीत करना एक प्रतिशत भी नहीं पसंद वह वहां से बाजार की तरफ निकल जाता है ।
कोटेदार रंगीलाल को बुलाता है ,और दोनों एक दूसरे से बढ़ा चढ़ाकर अभद्र वार्तालाप करने में जुट जाते हैं ।
रूद्र मार्ग में चलते चलते बस मन में ही सोचता है ,कि गौरी को आज उसने जिस स्थान पर देखा उसके लिए असुरक्षित था ।परंतु गौरी टंडन के कुख्यात से अज्ञान है। टंडन का मुखौटा उतरते ही गौरी का हृदय प्रताड़ित हो जाएगा ,रूद्र को इस बात का दुख भी है ,और साथ में सुख भी ।
क्योंकि सच्चाई सम्मुख हो जाने पर सब साफ हो जाएगा .......परंतु रूद्र गौरी को आघात होते हुए नहीं देख सकता। क्योंकि गौरी उसकी अच्छी मित्र बन चुकी है ।
रूद्र बस स्टैंड की तरफ मुड़ता है, और बस स्टैंड पहुंच जाता है । वहां पड़ी लकड़ी की एक टूटी तिपाई पर बैठ जाता है, और मन में कुछ सोचने लगता है ।तभी श्रद्धा आकर उसके सर को अपने हाथ से हिला देती है ।और जोर-जोर से हंसने लगती है......... कहती है डर गए ना!  मुझे पता था तुम डर जाओगे । पर जरा यह तो बताओ कहां खोये हुए थे ,......वह कहीं नहीं तुम भी श्रद्धा....... स्थिर नहीं रह सकती तूफान की तरह चलती हो ।
तुम तो जानते हो रुद्र मैं ना उदास रहती हूं ना ही किसी को उदास देख सकती हूं।
 पर तुम ना आजकल कुछ ज्यादा ही सोचने लगे हो, लग रहा है लक्ष्मी काकी ने बेटे को नहीं एक दार्शनिक को जन्म दिया ।और फिर से वह जोर-जोर से हंसने लगती है......... वास्तव में श्रद्धा बहुत खुशमिजजी है। वह बहुत ही किशोर बुद्धि की है ,जोकि निश्चिंत रहती है । दुःख मे भी आनंद ढूंढ लेती है ,श्रद्धा को फोटोग्राफी का बड़ा शौक है ।कुछ दिन पहले अपने पिता के साथ नैनीताल भ्रमण के लिए गई थी। वहां इतने रोचक और आकर्षक दृश्य से वह अत्यंत  प्रभावित हुई ।
 जिसे वह सारी उम्र आंखो में कर लेना चाहती थी । परंतु यह सोच रही कि....... क्यों ना उसके पास एक ऐसा कैमरा हो जिससे वह फोटो के साथ चलित चित्र भी प्राप्त कर पाती।
 इसी सोच को उसने अपने पिता के समक्ष प्रकट किया ।
कि वह उसे ऐसा  कैमरा दिलवा दे पर उसके पिता बार-बार उसकी इस इच्छा को नकार रहे थे
 वह बार-बार उस कैमरे के लिए अनुरोध कर रही थी ....
अंततः उसे वह कैमरा मिल ही जाता है ,उसकी हठ को देखकर उसके पिता ने उसे व कैमरा दिलवा ही दिया ।जिसे पाकर बहुत खुश हो गई, और उसे कई फोटो भी खींची जो अभी उसके पास हर वक्त रहता है। और वह उससे मनोहारी दृश्यों के फोटो खींचा करती हैं ।और उसकी दुनिया और सारी खुशी उस कैमरे तक ही सीमित है........ उसका सिर्फ एक ही मित्र है वह रूद्र. ..........
रूद्र कुछ देर वहां बैठा रहता है, तत्पश्चात अपने घर की ओर रवाना हो जाता है। वह इस वक्त भ्रमित है वह अपनी मना स्थिति को समझ नहीं पा रहा ।उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं......! कैसे वह इस गांव को एक नया स्वरूप प्रदान कर पाए उसकी अंतरात्मा उसे कचोट रही है ।
कि वह चाह कर भी कुछ कर सकने में असमर्थ है । क्योंकि सेठों की तानाशाही और गरीबों की लाचारी उसे  व्यथित कर रही है, वह जाकर सीधे अपने कमरे में चला जाता है ।
तभी रूद्र भैया की आवाज उसे सुनाई देती है ........... वह पीछे मुड़कर देखता है। तो उसे सरस्वती हाथ में कुछ पुस्तक के लिए खड़ी मिलती है ।रुद्र ...- सरस्वती से पूछता है ?कि क्या बात  सरस्वती कोई काम है। वह अजीब सी चापलूसी लिए चेहरे पर रुद्र  से कहती है,  कि वह उसे इन पुस्तकों के बारे में कुछ समझा दे, पर उस समय रूद्र बहुत चिंता में होता है ।
 उसका मन तो नहीं होता पर वह कहता है......... आओ बैठो पूछो क्या पूछना है।  वह बेढंगा सा प्रश्न पूछती है । कि यह बताइए भैया की इस पुस्तक के लेखक ने यह पुस्तक क्यों लिखी........? रूद्र को कुछ तो हंसी आती है, और कुछ प्रश्न में रोचकता भी दिखती है । वह सरस्वती से कहता है........ कि लेखक ने यह पुस्तक इसलिए लिखी, क्योंकि उसके मन में इस में उल्लेखित लेख को की पूर्व कल्पना की होगी।
 उसे अत्यंत मार्मिक लगे होंगे तभी उसने अपने भाव को इस लेख के द्वारा प्रस्तुत कर दिया।
 बस और क्या सरस्वती उछल पड़ती है........ और कहती है! भैया आपने तो कमाल कर दिया मैंने सब से पूछा पर किसी ने मुझे उचित उत्तर नहीं दिया ।
पर आपसे मुझे सही उत्तर प्राप्त हो गया है ।धन्यवाद भैया...! कह कर चली जाती है ।
तभी वह अपने कक्ष की खिड़की से बाहर झाँकता है ,तो देखता है । 
कि सामने से खुद जैसे चार समा जाने वाले कुर्ते को पहने चिपटी नाक तिरछी आंखो वाला कोई युवक चला रहा है । उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मनो वह विक्षिप्त हो ।
रुद्र उसे समझने का प्रयास ही कर रहा था, कि तब तक दूसरी ओर से गौरी उससे टकराती है। और गौरी के हाथ में थैला होता है, जो हूबहू ऐसा होता है, जैसा कि उस अजीबो गरीब व्यक्ति के पास।
 उससे टकराने पर गौरी का और उस व्यक्ति दोनों का थैला एक साथ सड़क पर गिर जाता है। और एकाएक वह दोनों एक- एक थैला उठाकर चल देते हैं ।रुद्र सब कुछ देख रहा होता है।  पर वह उस समय थोड़ा हिचकिचा गया जब गौरी और उस व्यक्ति के थैले में अदल बदल हो गई ; क्योंकि गौरी ने थैले एक समान होने पर उनकी परख किए बिना थैला उठाकर जल्दी में चली गई।
 और शायद वह व्यक्ति भी यह नहीं समझ पाया कि वास्तव में उसका थैला कौन सा है,  इतना देख रुद्र फौरन बाहर आकर देखता है; तो गोरी जा चुकी होती है। पर वह व्यक्ति वहीं पर घूम रहा होता है , रुद्र उससे थोड़े ऊंचे स्वर में कहता है .........रुकिए......! वह व्यक्ति रुक जाता है ।और अपनी टेढ़ी आंखों को और टेढ़ा कर के कहता है ।क्या है भाई....? क्यों रोका मुझे? मैं अच्छा खासा राह पर जा रहा था तुम जैसे लोग ही मेरा जीना दूभर किए हो ।अब क्या है? बताओ भी ।
रुद्र( संदेही स्वर में )उससे कहता है भाई आप का थैला देखना है? बहुत अच्छा है देखू तो ......अरे !क्या देखोगे इसमें कपड़े का ही तो बना है। पर रूद्र जानने के लिए उतावला था, कि थैला गौरी का है ,या सिर्फ उसे भ्रम हुआ है ।इसी के चलते रुद्र उससे बहस कर बैठता है । कि खाली आप का थैला ही तो देखना है, कोई ले तो लूंगा नहीं उसने उठाकर थैला रुद्र के आगे फेंक दिया ,क्रोध से और कहा लो देख लो। रुद्र ने थैला खोल कर देखा तो देखा तो उसमे कुछ फटे हुए कपड़े ,और जैसा कुर्ता उसने पहन रखा था वैसा ही एक कुर्ता पड़ा था । इसके अलावा और कुछ नहीं ,रुद्र थोड़ा शर्मिंदा हो जाता है, और क्षमा के भाव से उसे फिर से थैला वापस कर देता है ।और वापस चला जाता है ।

रात के आठ बज रहे थे , रुद्र काफी मानसिक थका हुआ था ।इसलिए वह स्वयं को आराम देने के लिए चुपचाप लेट जाता है। पर आज की रात उसे बड़ी भयावह लग रही है, चलने वाली हवाएं भी काफी उलझी सी प्रतीत हो रही थी, हवेली के बाहर सन्नाटा छाया हुआ था, कुत्ते और बिल्लियों के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी, रात बहुत ही बेचैन सी प्रतीत हो रही थी ।
उसके मन में उसके मन में बार-बार कुछ दुख और सुख के भाव हिलोरे खा रहे थे। उसका मस्तिष्क बार-बार उसे कुछ संकेत देने का प्रयास कर रहा है ।परंतु उस भाव को स्पष्टता समझने में असमर्थ था ।पर वह अपने मन में यह भी सोच रहा था ;कि शायद वह मानसिक तनाव में है, जिसके कारण उसके साथ ऐसा हो रहा है ।पर वह कुछ भी कर सकने में खुद को बहुत असहाय महसूस कर रहा था । लेटे लेटे करवटें बदलता रहता है, और थोड़ी देर में सो जाता है।
वह सो तो जाता है, पर सुप्ताअवस्था में भी उसका मस्तिष्क कार्य कर रहा होता है। उसके हृदय में एक अजीब सी विहलता हलचल किए हैं,वह कामयाबी को पाने के लिए हर हद तक जाने को तैयार है। आज की रात की सनसनी खामोशी उसे दंग किए हैं, क्योंकि उसका जीवन अब एक नए अध्याय में परिवर्तित होने को सज्ज है।पर वह इस परिवर्तन को समझ नहीं पा रहा।
 सुबह होती है....... रूद्र अपनी आंखें खोलता है ,सूरज की रोशनी उसके कमरे के बंद रोशनदान को चीरती हुयी उसकी आंखों पर आ टिकी है, ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सूर्य देवता उसे स्वयं जगाने का प्रयास कर रहे हैं । पंछी आज कुछ अधिक ही शोर मचा रहे हैं ,उनकी कौतूहल का स्वर आज कुछ दुखान्त और कुछ सुखान्त का वर्णन कर रहा है।
 क्या कह रही है........ आज की  सुबह इसका प्रत्यक्षीकरण तो बाहर जाते ही मालूम होगा । उसके हृदय में एक अजीब सा द्रवित भाव उत्पन्न  हो रहा है, परंतु पीड़ादायक भी। वह फर्श पर पड़े चप्पल पहनकर हवेली के द्वार से तेजी की ओर बाहर जाता है। सड़के मौन है ,चबूतरे वाला पेड़ अपना कुछ खो देने का भाव प्रकट कर रहा है। सारे लोग उसे कॉलेज की तरफ जाते हुए दिखाई पड़ते हैं। वह फट से दौड़कर व्यक्तियों से पूछता है ,काका क्या हुआ? आप कहां जा रहे हैं, पर कोई भी व्यक्ति कुछ कह सकने में समर्थ नहीं है । रुद्र  दौड़ते हुए कॉलेज पहुंचता है..... वहां उसे जो दिखता है । उससे पर स्तब्ध रह जाता है ,वह जो देख रहा होता है.... वह उसे स्वीकार नहीं कर पाता । वह एक निर्जीव खंभे की भांति खड़ा है, जिसमें ना स्वर है ,  ना जीवन एकाएक वह जोर से चिल्ला उठता है .......छप्पन न नन् नन..... ये क्या हुआ किसने मारा तुम्हें। किसकी इतनी हिम्मत ।

पुलिस अपनी तहकीकात करने में व्यस्त होती है, रूद्र पूछता है ,सर किसने मारा छप्पन  को यह कैसे हुआ ....? और कब हुआ रुद्र  , छप्पन  की इस निर्मम हत्या को देखकर बहुत हताश हो जाता है। उसका हृदय अत्यंत वेदना से भर जाता है । पीछे से गौरी आकर उसके कंधे पर हाथ रखती है ,और कहती है..... परेशान ना हो  रुद्र  अपने आप को संभालो । पुलिस इसकी तहकीकात  कर रही है ना , तुम चिंता ना करो पुलिस छप्पन की लाश को शहर के सरकारी चीरखाने में पोस्टमार्टम के लिए भेज देती है ।रुद्र का मस्तिष्क इस घटना से पूरी तरह से अनियंत्रित हो जाता है, वह यह सोच रहा होता है ,कि ऐसा भला कौन कर सकता है छप्पन  तो एक बेवड़ा था। जिसका किसी से कोई मतलब ना था छप्पन  की हत्या गोली मारकर की गई थी।
 दूसरे दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आती है, जिससे यह पता चलता है, कि उसे हत्या से दो दिन पहले बुरी तरीके से पीटा गया था। जिससे उसके शरीर के अंगों पर हड्डियों में काफी चोट आई थी ।
 पर पुलिस यह जानने में असमर्थ थी, कि इसके पीछे किसका हाथ है । 
रुद्र वही कॉलेज के सामने पड़ी बेंच पर बैठा होता है । तभी श्रद्धा आती है ......और उसके दुख को कम करने का प्रयास करती है। और वह उसे यह सांत्वना देती है, कि जल्द से जल्द छप्पन  के अपराधी को पुलिस पकड़ लेगी । तुम चिंता ना करो ,रुद्र उसकी बात सुनकर कहता है। कि श्रद्धा मैं भी यही उम्मीद करता हूं । पर अगर पुलिस या काम ना कर सकी, तो मैं स्वयं उस अपराधी को पकड़ कर उससे कड़ी से कड़ी सजा दूंगा।
 लेकिन श्रद्धा को खाली हाथ देखकर रूद्र पूछता है। श्रद्धा तुम्हारा कैमरा कहां है...... तुम तो अपने कैमरे के बिना कहीं नहीं जाती हो । फिर आज तो तुम कैमरे के बिना आई हो । श्रद्धा थोड़ा दुखी होकर कहती है। कि रुद्र मेरा कैमरा खो गया है  .......अरे! कैसे? वो ना मैं कहीं रखकर भूल गई मुझे याद ही नहीं आ रहा । पूरे घर में ढूंढा पर कहीं नहीं मिला । क्या तुमने देखा है........? कहीं ...! नहीं मैंने कहीं देखा तो नहीं पर मैं उसे ढूंढने में तुम्हारी सहायता अवश्य कर सकता हूं । याद करो तुम अपना कैमरा आखिरी बार कहां लेकर गई थी । 
हां ! रूद्र मुझे याद आया ,मैं यहां पर पेड़ पर बैठे तोते का फोटो खींच रही थी। फिर शायद मैं जल्दी में कहीं चली गई थी । पर उसके बाद मुझे नहीं याद आ रहा कि मैंने क्या किया ।
चलो देखता हूं........ रूद्र पेड़ के आसपास ढूंढने लगता है। तभी अचानक उसकी नजर पेड़ की एक शाखा पर पड़ती है। जिस पर उसे कैमरा लटका नजर आ जाता है।  वह कैमरा उतारता है ..... श्रद्धा को दिखाकर कहता है ...! श्रद्धा तुम्हारा कैमरा इधर है , कहां - कहां ढूंढा और मिला कहां ,श्रद्धा कैमरा देखकर उछल पड़ती है । रुद्र  से धन्यवाद कहती है । वह कैमरा पाकर बहुत प्रसन्न हो जाती है । पर रूद्र अभी भी  दुखी भावो को मन में दबाए हुए हैं । 
श्रद्धा अपने कैमरे  के बटन को खोलती है पर उसकी ऊर्जा समाप्त हो चुकी होती है, जिसके कारण वह खुल नहीं पाता। ओफो !  मुझे लग रहा है इसकी बैटरी समाप्त हो चुकी है । तुम रुको मै  इसे थोड़ा चार्ज कर लूं । फिर तुम्हें दिखाऊं जो मैंने कल तस्वीरें खींची थी । बड़ी मनोरम और सुंदर है, तुम देखोगे तो तुम्हें लगेगा कि जैसे मैंने इस कैमरे में प्रकृति ही कैद कर ली हो ; और तुम्हें अच्छा भी लगेगा।  श्रद्धा कैमरे को चार्ज करने के लिए उसे पास की दुकान पर लगा देती है, जो बिहारी वाजपेयी की है और कहती है बिहारी भइया मै अभी ले जाऊंगी ।
 वापस आकर फिर रुद्र के पास ही बैठ जाती है , और रुद्र को को समझाने लगती है उसे धीरज बधांती है । कि तभी रुद्र के पीछे  कंधे पर  कोई हाथ रखकर सहानुभूति देने की कोशिश करता है । वह पीछे मुड़ता है ..........तो उसे उसके पिता खड़े मिलते हैं ,उन्हें देखकर बहुत खड़ा होता है ,और कहता है, डैडी आप...!   हां मैं यहां से गुजर रहा था , तुम्हें  हताश बैठा देख मैंने सोचा तुमसे मिलकर चलू वैसे भी दिन भर तो मुझे मौका मिलता नहीं, जो मैं तुमसे दो चार बातें करूं । पर इस समय मेरे बेटे को मेरी आवश्यकता है, तो मैं चला आया ।
वह उसे काफी देर तक समझाते हैं, कि रूद्र तुम चिंता ना करो छप्पन का अपराधी जल्दी ही पकड़ा जाएगा । श्रद्धा भी यही कहती हैं ,कि अंकल मैं भी तो रुद्र को यही कह रही थी । मुझे भी छप्पन  के मरने का काफी दुख है।( जिग्नेश )रुद्र के पिता थोड़ी देर बाद वहां से चले जाते है । और रुद्र से कहते है, कि अभी तुम जल्दी घर आ जाना । तुम्हारी मां तुम्हारा इंतजार कर रही होगी ......और वैसे भी तुम्हें तो  पता है , कि वह तुम्हारे बिना खाना नहीं खाएगी। हां डैडी .....! मैं अभी आता हूं ,श्रद्धा  उसका मन बांटने के लिए कहती है,  रुको मैं कैमरा ले आऊं। देखें चार्ज हो गया है ,फिर मैं तुम्हें वह तस्वीरें दिखाऊ ।
 रूद्र झूठी हंसी से होंठ चौड़े करके कहता है ।दिखाओ ........
श्रद्धा कैमरा लेकर आ जाती है, और जैसे ही कैमरा खोलती है, उसके सामने ऐसी तस्वीर आ जाती है  । जिसे देख कर रुद्र और श्रद्धा  दोनों चौक जाते हैं , एक चलित चित्रांकन (वीडियो रिकॉर्डिंग) था । जिसे श्रद्धा  बड़ी उत्सुकता से चालू करती है, वह दोनों ही उस अंक (क्लिप) को देखने को उत्सुक थे । उसे वह दोनों देखने लगते है पहले के लगभग चालीस पचास  मिनट के अंक में कुछ ना था । उसके बाद उसमें जो देखने को मिला उससे सब कुछ स्पष्ट हो गया था।  छप्पन  की हत्या, हत्या के कारण , हत्या करने वाला सभी सत्य अनावरण हो चुके थे । उसे पूरा देखने के बाद सब कुछ स्पष्ट हो चुका था। अब अगर कोई कार्य शेष रह गया था , तो वह था उन हत्यारों को उनके कर्मों के अनुरूप फल मिलना ,  यह सब कुछ अब रूद्र और श्रद्धा  के हाथ में था । यह सब कुछ देखने के पश्चात रुद्र सोचता है। कि अब मुझे प्रतीत हुआ, कि उस रात मुझे दुख और सुख दोनों भावो का अनुभव क्यों हो रहा था।
दुःख तो मैंने देख लिया , जो कि मेरे लिए अत्यंत कष्टकारी था । परंतु सुख अब देख रहे हैं । तो यह कारण है, कि इसलिए प्रकृति मुझे संकेत दे रही थी । सच में कुछ तो विचित्र होने वाला है ,अपने चेहरे पर एक गर्वित मुस्कान लाकर कहता है .........
शाबाश.......! छप्पन  तुमने वास्तव में वह कर दिखाया जो तुमने कहा था। तुमने कहा था, कि अगर मरूंगा तो मेरा मरना भी बेकार नहीं जाएगा ।  यह सत्य साबित हुआ छप्पन  मुझे तुम पर गर्व है, तुम सच में महान और गौरवशाली हो ।
जिस कार्य को सफल बनाने में मैं इतने दिनों से प्रयासरत था। उसे तुमने एक क्षण में कर दिया।
 अब रूद्र के मन में सिर्फ एक ही भाव उमड़ रहा था , कि वह कितनी जल्दी "मऊ जिला" पहुंचकर वहां के कलेक्टर के समक्ष वह प्रमाण प्रस्तुत कर पाए। श्रद्धा का भी मन उछाल खा रहा था, कि यह सब कुछ बहुत जल्दी साफ हो जाए । ताकि खुटकपुर  अपनी आजादी की सांसें भर पाए ।
पर उस दृश्य में जो श्रद्धा और रूद्र ने देखा वह अकल्पनीय था।
 क्योंकि जिसने छप्पन  की हत्या की रुद्र कभी स्वप्न में यह नहीं सोच सकता था, कि वह कभी ऐसा निंदनीय तुच्छ कार्य कर सकता है ।
पर जो भी हो सत्य तो समक्ष ही था , जिससे वह बहुत प्रसन्नत जिस कृत्य से खुटकपुर के लोग एक नए अध्याय में प्रवेश करने जा रहे थे ।
जो उनका एक अविश्वसनीय सपना था, वह यथार्थ में परिवर्तित होने जा रहा था।
 रुद्र घड़ी देखता है , जो उसके हाथ में बंधी है ।इस समय दोपहर का एक बज रहा है । और खुटकपुर से मऊ की दूरी तीन घंटे की है। अपनी जेब में पैसे देखता है, उसकी जेब में तीन सौ रुपये पड़े हैं ।
जो मऊ के जाने आने के लिए पर्याप्त राशि है। जिसमें वह एक समय का भोजन भी कर सकता है । रूद्र श्रद्धा से उसका कैमरा लेकर खुटकपुर बस अड्डे पर पहुंच जाता है , श्रद्धा उसके साथ उसे बस तक छोड़ने आती है । मऊ जाने वाली बस का समय डेढ़  बजे का है,  एक बजकर बीस मिनट  हो चुके हैं। अब मात्र 10 मिनट ही शेष थे ।
रुद्र श्रद्धा से कहता है......... कि वह चुपके से हवेली जाकर उसकी उसकी मां (लक्ष्मी) को बता दे सारी घटना, और मां से कहे वह यह बातें किसी को ना बताएं । जब तक मैं वापस ना आ जाऊं , वह सब का ख्याल रखें, और अपना भी। 
  श्रद्धा उससे कहती हैं.......... रूद्र तुम अपना ख्याल रखना और खाना भी समय से खा लेना,  मैं प्रार्थना करूंगी कि तुम सफल हो जाओ  ।
 इस वार्ता  के बाद रूद्र कैमरा लेकर बस में जाता है । श्रद्धा उसे शुभ यात्रा कह कर हवेली की तरफ मुड़ जाती है । रूद्र बस में बैठकर मऊ के लिए रवाना होता है ।

 उसके मन में उमंगे दौड़ रही है, कितनी जल्दी पहुंचू और कलेक्टर के सामने सत्य पेश करू। उसकी नजरें घड़ी की सुई पर टिकी है आखिर मऊ आ ही जाता है, वह बस  से उतरता है ....... कैमरा लेकर कलेक्टर साहब की खोज में निकलता है ।रास्ते में उसे एक रिक्शेवाला मिलता है ,उसे रोक वह सोचता है, कि इसे जरूर पता होगा वह उसे रोककर कहता है...........भाई कलेक्टर ऑफिस चलोगे । वह हामी भरते हुए कहता है , हां साहब  चलिए ।
रुद रिक्शे में बैठ जाता है........  लगभग दस मिनट में वह कलेक्टर के दफ्तर में पहुंचा देता है। रूद्र रिक्शेवाले से कहता है , भाई कितना हुआ, वह दो रुपये बताता है। रुद्र की जेब में दो रुपये नहीं होते है, उसकी जेब में पांच और कुछ दस, पचास की नोटे पड़ी होती हैं। वह उसमे से पांच रुपये निकाल कर दे देता है, और कहता है भाई रख लो खुले नहीं है । वह मना करता है, कहता है साहब मैं हक का ही लेता हूं, पर रुद्र कहता है,  अरे ! नहीं भाई रख लो । वह शुक्रिया कर के चला जाता है । रुद्र दफ्तर मे प्रवेश करता है......... कलेक्टर साहब के कमरे के बाहर खड़े सिपाहियों से अंदर जाने की मंजूरी मांगता है । तभी एक सिपाही उसे कुछ क्षण रुकने को कहता है।  वह रूद्र से ..............कमरे  के बाहर बने बरामदे में पड़ी थी तिपाई पर बैठने का इशारा करता है । रुद्र से अब एक क्षण भी रुकना असंभव प्रतीत हो रहा है ,पर वह उसके कहने पर वहां रुक जाता है।  सिपाही अंदर जाकर कलेक्टर साहब को सलाम ठोकते हुये कहता है ...........सर आपसे कोई लड़का मिलना चाहता है। कलेक्टर रणदीप सिंह उससे पूछता है....... कौन है ? सिपाही कहता है .....पता नहीं सर पर कोई सभ्य मनुष्य प्रतीत हो रहा है । वही कोई इक्कीस बाईस  वर्ष का लड़का है। रणदीप सिंह कहता है .....उसे अंदर भेजो ।सिपाही बाहर आकर रुद्र से कहता है ......तुम अंदर जा सकते हो । रूद्र बिना कोई समय नष्ट किए अंदर पेश हो जाता है ।

नमस्ते सर ! गुड इवनिंग..... कलेक्टर साहब सर हिलाते हुए उसके अभिवादन को स्वीकार करते हैं । कमरे के अंदर रणदीप सिंह से चार कदम पीछे खड़े होकर वह अपनी बात प्रस्तुत करता है। सबसे पहले वह स्वयं से उनको अवगत कराता है। अपना परिचय देकर फिर वह अपनी उस बात की शुरुआत करता है ....; जिसके लिए वह विशेषकर आया है।  कलेक्टर की कुर्सी के सामने रखी मेज पर वह कैमरा खिसकाते हुये कहता है .......... सर इसी कमरे में ही वह प्रमाण है जो हमें अपराधी से परिचित कराएंगे । वह साथ में हाथ जोड़कर निवेदन करता है! कि इस कार्य को सफल बनाने में वह उसकी मदद करें  । रणदीप सिंह एक सच्चा ईमानदार व्यक्ति था , उसने स्वयं को तानाशाही कुरीतियों का नाश करने के लिए ही चुना था ।मध्यमवर्गीय लोगों का जीवन सवारना उसकी प्राथमिकता थी । उसने कैमरे को खोलकर उसमें पड़े उस दृश्य को पूरा देखा और यथार्थता समझने के पश्चात, वह तुरंत खुटकपुर  चलने को तैयार हो गया । उसने तुरंत अपनी लाल बत्ती की गाड़ी तैयार करने को सिपाही को आदेश दिया।  और रुद्र के साथ बैठकर रवाना हुआ । शाम के छः बज रहे थे लगभग नौ बजे तक हम खुटकपुर  पहुंच जाएगें .....कलेक्टर ने कहा । पर रुद्र  से अब यह तीन घंटे कटना असहनीय प्रतीत हो रहा था।  वह रास्ते भर अपनी जीत की प्रतीक्षा में व्यस्त रहा। कैसे भी तीन घंटे बीत ही गए खुटकपुर आ ही गया ।
गाड़ी सीधी सायरन की आवाज फेकती हुई हवेली के सामने आकर रूकती है। गाड़ी से रुद्र ,कलेक्टर रणदीप सिंह और चार पुरुष सिपाही , दो महिला सिपाही उतरते है। कलेक्टर का हवेली के अंदर प्रवेश हुआ .......हवेली के चौकीदार गुलामसिंह नमस्ते ! कर स्वागत करता है। प्रोफेसर खाने की टेबल पर बैठा हुआ था, और पूरा परिवार भी साथ में खाना खा रहा था । टेबल के दूसरे छोर की कुर्सी पर गौरी भी बैठी थी । जहां अक्सर रुद्र  बैठा करता था । कलेक्टर को हवेली के अंदर देख कर सभी चौक गए, कोई कुछ कहता उससे पहले ही कलेक्टर ने सिपाहियों से कहा.............अरेस्ट कर लो! इस वाक्य ने सारी हवेली को ही हिला दिया था ,पर कलेक्टर का इशारा किसकी तरफ था ;यह कोई नहीं समझ पाया ।
सिपाहियों के पास चार हथकड़िया थी , चारों हथकड़ियां लेकर वह टेबल की ओर बढ़े। चारो हथकड़ी चारों लोगों को पहना दी । जिसमें से पहला हाथ प्रोफेसर टंडन का ,और दूसरा सोमेश्वर का तीसरा करुणेश का ,और चौथा हाथ ऐसा था जिसमें हथकड़ी नहीं चूड़ियां शोभा देती है; पर कर्म चूड़ियां नहीं हथकड़ियां ही पहनने वाले थे । "जो कि गौरी के हाथ थे" रुद्र ने मुस्कुराकर ताली बजाते हुये कहा....... वाह वाह वाह ! गौरी दो मुखौटो के बीच जीवित कैसे रह सकती हो। दम नहीं घुटता तुम्हारा , "कड़छी पकड़ने वाले हाथ इतना घिनौना अपराध भी कर सकते हैं, मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था "।
 चारों लोग अचानक बोल पड़े ......कि आखिर हमारी गलती क्या है। हमें क्यों बंधक बनाया गया है। उन चारों के इस प्रश्न पर कलेक्टर रणदीप सिंह  बोल उठा अभी बताता हूं .....कि तुम्हें क्यों बंधक बनाया गया है। कैमरा खोल कर सामने मेज पर रख दिया। और कहा कि अब देखो कि तुम्हारे क्या कर्म हैं । उस विडियो रिकॉर्ड  में जो दिखा उसे सब देखकर भयभीत हो गए । जिससे छप्पन  को प्रोफेसर टंडन, सोमेश्वर ,करुणेश और गौरी घेर के खड़े हैं । वह चारों उसे मारपीट कर उसे कुछ कह रहे हैं। कुछ देर ऐसा ही चलता रहता है, तभी अचानक से गौरी अपने थैले से रिवाल्वर निकालती है ... छप्पन  के सीने में दो गोलियां उतार देती है । वह वही थैला होता है जो उस अजीबो गरीब व्यक्ति के थैले से अदल बदल हो गया था।  गौरी के  इस भयकारी और तुच्छ निर्दय कृत्य को देखकर सभी दंग हो जाते हैं । पुलिस उन चारों को हिरासत में ले लेती है । पूछताछ करने के पश्चात यह पता चलता है .......कि गौरी विदेश से आई एक तस्कर है । जो कि नशे की दवा और चरस अफीम का व्यापार करने भारत आई थी । जिसका भारतीय सहयोगी प्रोफेसर टंडन था । कॉलेज को इसका अड्डा  बनाना चाहती थी ।
गौरी का विदेश से आना, संस्कारी होने का दिखावा करना , कॉलेज मे पढ़ाने का नाटक करना ,यह सब तो सिर्फ एक दिखावा था। सत्य में तो उसका मंतव्य अपने गैरकानूनी कारोबार का बढ़ावा करना था । यह बात जब छप्पन को पता चल गई थी , हत्या के दो-तीन दिन पहले वह कॉलेज के पास बैठा था , तभी कॉलेज के अंदर से किसी के बोलने की आवाज आई उसने अंदर जाकर देखा;  तो प्रोफ़ेसर टंडन के दोनों बेटे और गौरी कालेज के तहखाने को नशीली दवाओ को रखने की बात  कर रहे थे , ये बाते छप्पन को पता चली तो उसने चिल्लाना शुरु कर दिया। यह सारी बातें बाहर किसी को पता ना चले इसलिये उसे कमरे में बंद करके खूब पीटा । और दो दिन बाद छप्पन के नाम मानने पर उसकी हत्या कर दी ।
 गैर कानूनी हथियारों का व्यापार करने वाले उस  व्यक्ति को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया । खुटकपुर के साथ टंडन ने जो हैवानियत की थी उसका भी प्रत्यक्षीकरण हो चुका था । खुटकपुर में जितने भी टंडन के चमचे थे, सब की तानाशाही खत्म कर गांव को एक नया स्वरूप प्रदान कर दिया गया था। रूद्र अपने मकसद में कामयाब हो चुका। वास्तव में "गौरी का चरित्र "बहता आकाश" था"। जिसकी वास्तविकता कुछ और थी , जिस तरह बहते बादल को देखकर ऐसा प्रतीत होता है ,कि मानो आकाश बह रहा हो ,उसी तरह गौरी अपनी वास्तविकता से भिन्न थी।
 छप्पन की मौत ने एक ऐसी सुनामी को जन्म दिया , जिसने खुटकपुर की काया पलट कर दी ।उसके शब्द आज भी सच प्रतीत हो रहे हैं , कि जब मैं मरूं तो मेरे मरने के बाद एक तहलका मच जाये 
ट्विंकल -  दादी मां तब तो पापा बहुत बहादुर थे मुझे भी पापा जैसा बनना है तभी ट्विंकल के पापा( रुद्र और श्रद्धा )दोनों खिलखिला कर हंस पड़ते हैं।

धन्यवाद 
-Alpika Awasthi

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