॥●●सप्तस्वर ●●॥
समारंभ संगीत स्वर विद्या वर ज्ञान-दायिनी।।
प्रथम स्वर षड्ज का उत्थान मयूर से।
आरंभ हो गीत सारे दो सौ छप्पन कंप से।।
उच्चारित उर,तालु,नासिका,दंन्त,कंठ से।
आमोद हृदय का छिड़े'छः' के उत्पन्न से।।
रे➡रेवती अपूर्ण क्यों रहे द्वितीय स्वर ऋषभ से।
द्वितीय स्वर हो उच्चारित दो सौ अट्ठारह कंप से।।
भेद इसके है रमे पयस्विनी के स्वर भाव से।
आत्मसात हो रहा है वीणापाणि के संगीत यंत्र से।।
गा➡गांधार का उत्कर्ष हो गेष्णा के गान से।
तृतीय स्वर हो उच्चारित तीन सौ बीस कंप से।।
छेरी की कंठ वाणी प्रस्फुटित हो गांधार से।
प्रेम के यह सप्तस्वर भिन्न कहां संसार से।।
मा➡मंदाकिनी सा प्रभावित चतुर्थ स्वर राग से।
कराकुल की नम्र वाणी व्याप्त हो अनुराग से।।
सप्तस्वर के मध्य राजे पर्ण शतदल सामान से।
प्रेम भरे मन में जैसे रवि जग भर दे प्रकाश से।।
पा➡पदमहस्ता प्रभु कलत्र प्राश्रृ हो प्रकीर्ण से।
स्वर पंचम हो उउच्चारित सारिका की गिरा से।।
परमेश्वरी के वलय ध्वनि सा बना दे श्रंगार से।
इंद्रधनुष जिस भांति छिटका दे नभ मंजरी से।।
धा➡धवलित राग पराग सा ब्रह्मलोक को अवरणित किये कुंजन से।
षष्ठ स्वर प्राकट्य वाक उच्चारण सैधव से।।
स्वर से प्रांश मधुकर कवि हृदय से।
रति का विस्तार हो संगीत की मधु तान से।।
नि➡ निर्मल र्निर्झरिणी सा प्रवाहित सातवां स्वर निखिल से।
निषाद शब्द से बना चार सौ अस्सी कंप से।।
गूंजता और आनंद स्वर मतंग से।
व्योम तक है छिटक रहे स्वर सप्तचंद्र से।।
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