तितीर्षा
मेरी देह भस्म से सच्चे निश्चल निस्वार्थ
प्रेम की ही गंध पाओगे ।
जो टटोलोगे मेरे अंतस्थ हृदय को
तो स्वयं का वहां चित्र पाओगे।।
तुम्हारे और मेरे मध्य वही अन्वय है ,
जो हरसिंगार का उसके नाम से है।
श्रंगार तो उपस्थित हैं सारे ,
फिर भी दुखांत तरु कहलाता है ।।
क्या हरसिंगार को उसके उपनाम से
दूर कर पाओगे..........?
जो टटोलोगे मेरे अंतस्थ हृदय को
तो स्वयं का वहाँ चित्र पाओगे ..........
मुस्कुरा दो संभवत यही स्मृति मात्र शेष बचेगी ,
मैंने तो हृदय की आंखों से देख लिया।
पर तुम्हें देखे बिना इन नेत्रो की,
पिपासा कैसे बुझेगी।।
विलंब मत करो वरना
अवशेष भी नहीं पाओगे .........!
जो टटोलोगे मेरे अंतस्थ हृदय को
तो स्वयं का वहां चित्र पाओगे........
ये काव्य नहीं यह हृदय की करुणा है,
तुम तक पहुंच जाए इसकी आंह
तो सार्थक यह कहना है ।
क्या मेरे नेत्रों से मेरी
गुप्त वेदना पढ़ पाओगे .......?
जो टटोलो के मेरे अंतस्थ हृदय को
तो स्वयं का वहाँ चित्र पाओगे .........
प्रेम में पाने की नहीं समर्पित कर देने की इच्छा है ,
मात्र मध्य में जाने कि नहीं
डूबकर तर जाने की इच्छा है।
मेरी तरह क्या तुम भी मुझे
अपना परिशुध्द प्रेम दे पाओगे ..........?
जो टटोलोगे मेरे अंतस्थ हृदय को
तो स्वयं का वहाँ चित्र पाओगे .........
स्वीकार करो तो जीवन अन्यथा और कुछ नहीं ,
त्यज प्राण प्रेम में सुरलोक मोक्ष की तितीर्षा नहीं ।
छोड़कर कुसुम नगरी क्या तुम मुझे
प्रेम के परमधाम तक पहुंचा पाओगे........?
जो टटोलो के मेरे अंतस्थ हृदय को
तो स्वयं का वहां चित्र पाओगे.........
#तितीर्षा
बहुत सुँदर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका
Deleteमेरी प्यारी जीजी मईया कितनी प्यारी रचना है,,कृष्ण विरह,,
ReplyDeleteराधे कृष्ण 🙏🙏
बहुत बहुत धन्यवाद मेरा बच्चा
Deleteबहुत सुन्दर अभिव्यक्ति🙏👌💐
ReplyDeleteजी धन्यवाद
DeleteBhut khub...👌👌👌
ReplyDeleteजी बहुत बहुत धन्यवाद
Deleteअद्वितीय अद्वितीय अद्वितीय मेरी जीजी निःशब्द
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका मेरे कान्हू 😊😊😊
Deleteअद्धभुत आदित्य सुंदर मनोरम, मैन प्रसन्न हो गया...
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका
Deleteबहुत ही सुंदर अभिलेख अद्भुत
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद आपका
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