●●●कुछ तो सोचा होगा मैंने●●●
कुछ तो सोचा होगा मैंने.......! है जन्म मेरा यह मर्यादा का मर्यादित हूं अपनी भावनाओं पर। जानकर अनजान रहना है यही प्रवृत्ति मेरी। अब तो पहचान गए होगे कि कौन हूं मैं ? हां मैं अबला हूं ...... वह मुकुट जो देवी के सर पर चढ़ा है, है बड़े ही पहरे उस पर कुछ ऐसा ही है जीवन मेरा क्या जन्म मेरा छुप-छुपकर कर ही जीना है, क्या स्त्री को बस यही सहना है ।। मायका रहा बड़ा सलोना पर कुछ तो था मुझको सहना। पीहर के थे सपने स्वर्णिम पर भाग्य ने कैसा खेल किया। हाय यह क्या हुआ कुछ ऐसा हुआ जो कहा नहीं गया।। छोड़ दिया अपने अस्तित्व को , विस्मरण किया कि कौन हूं मैं ? बावर्ची हूं या हूं धोबिन या तुलना मेरी नौकरानी की, पता नहीं क्या आस्तित्व है मेरा भूल गई कि कौन हूं मैं.......!