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अब प्रेम का नाम मत लेना..

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मैं तुम्हे पाना नही चाहती बस  दूर से यूं ही तुम्हे प्रेम करना चाहती हूं तुम्हे पा लूंगी तो प्रेम न कर सकूंगी तुम्हे पाकर मैं तुम्हे खो दूंगी तुम्हारे छल भरे व्यवहार से आहत हो  तुमसे घृणा करने लगूंगी मैने कभी तुम्हे छुआ नहीं  पर फिर भी तुम्हारे अधरो का स्पर्श महसूस करती हूं आज तुम्हारे नाम की मेहंदी से रंगा है हाथों को पर उस रिक्तता को कोरा ही छोड़ दिया जो तुमने कभी छोड़ी थी मैं तुम्हारे लिए बस श्रद्धा और दया की पात्र हूं प्रेम की नही और होना भी नही चाहती  क्योंकि तुम्हारा प्रेम प्रवंचना है और मैं उस पर आरूढ़ हो धोखे की यवनिका में छिपना नही चाहती मैं तुम्हारे विरह में जीना चाहती हूं क्योंकि वह आनंद है जो देह की परिपाटी पर नही हृदय की कसौटी पर कसा जाता है एक चिर आनंद जो तुम्हारे ठिठोली करते चंचल नेत्रों  की अरुणता और मेरे गजरे में गूथे बेला और पलाश क्षण प्रतिक्षण अनुभव करते है  उसे शिथिल नही पड़ने देना  दया ही बहुत है पर अब दोबारा कभी प्रेम का नाम मत लेना अब मैं तुम्हारा प्रेम नही चाहती बदले में  तुमसे दूर रहकर अश्रु जल से शहस्त्र श्रद्ध...